कवि कोकिल रस भरल गीत सँ
देलनि पोथी जुड़ल प्रीत सँ
कहलनि "सब रचना संताने
पढ़ब ध्यान सँ, रहि सज्ञाने"
मुड़ा करब की, राखल पुस्तक
टीनहा पेटी में नतमस्तक
दाम ने लागल, मोल ने बूझल
ज्ञान प्रकाशक बात ने सूझल।
पूस मॉस के जाड़ अभागल
नाक बहइ छल, सर्दी लागल
बैद्यराज बन्हलइन छः पुड़िया
कहलन्हि चूसब भोर - दुपहरिया
मंगनी में औषधि भेटल छल
तैं बेमातर सन फेकल छल
दाम ने लागल, मोल ने बूझल
यथा स्वास्थ्य के बाट ने सूझल।
बिन कहने जे भेट जाइत अछि
बिन किनने जे आबि जाइत अछि
टकर स्वाद बूझब बड़ मस्किल
अर्थ अछइतो व्यर्थ रहइत अछि
चलू बंधु नव बाट बनाबी
मोल चुका क' मान बढाबी
भने विलम्बहि, आँखि त ' फूजल
मूल ज्ञान के बाट त ' सूझल।
देलनि पोथी जुड़ल प्रीत सँ
कहलनि "सब रचना संताने
पढ़ब ध्यान सँ, रहि सज्ञाने"
मुड़ा करब की, राखल पुस्तक
टीनहा पेटी में नतमस्तक
दाम ने लागल, मोल ने बूझल
ज्ञान प्रकाशक बात ने सूझल।
पूस मॉस के जाड़ अभागल
नाक बहइ छल, सर्दी लागल
बैद्यराज बन्हलइन छः पुड़िया
कहलन्हि चूसब भोर - दुपहरिया
मंगनी में औषधि भेटल छल
तैं बेमातर सन फेकल छल
दाम ने लागल, मोल ने बूझल
यथा स्वास्थ्य के बाट ने सूझल।
बिन कहने जे भेट जाइत अछि
बिन किनने जे आबि जाइत अछि
टकर स्वाद बूझब बड़ मस्किल
अर्थ अछइतो व्यर्थ रहइत अछि
चलू बंधु नव बाट बनाबी
मोल चुका क' मान बढाबी
भने विलम्बहि, आँखि त ' फूजल
मूल ज्ञान के बाट त ' सूझल।