Wednesday, July 28, 2010

निराशाक बन्न घर

बन्न घर में ओ
एकसरे बैसल
डरैल/घबरैल
कोनो उत्साह नईं
कोनो उम्मीद नईं..

कईएक बेर कहलियई
कतेक बुझेलियई
तोड़ि दे केबाड़
उखाड़ि दे खिड़की
बाहर निकल भाई
तोहर एहि संसार सँ बाहर
आरो छै संसार
इजोत छै, सुगंध छै
मनुक्ख में प्राण छै..

नईं सुनैत अछि ओ
ओहिना बैसल निःशब्द
निष्प्राण/निस्तेज
डरैल/घबरैल
मुदा, हमरा अछि विश्वास
टुटतई केबाड़/खिड़की
ढहतई निराशाक बन्न घर
बाहर निकलत ओ
हँसत, गीत गाओत
हमरा अछि विश्वास
एखनहुं किछु नीक छै
एखनहुं किछु ठीक छै...

Monday, July 19, 2010

सपना

यऊ मालिक
बड़का गलती भ' गेल
एगो सपना देख लेलियइ..

देखलियइ जे
भरि पेट खेलियइए....
छौड़ा-छौडी
ओकर सबहक माय
सब खेलकइ
भरि पेट/भरि मोन..
बड्ड नजायज भ' गेल
एहन सपना देख लेलियइ..

की करियौ मालिक
आँखियो के बुझाइए कान भ' गेलैए
सुनय लगलइए अंतड़ीक कुहरब
तैं बुझाइए देख लेलकइ
बेहुद्दा
एहन अनर्गल स्वप्न

बड़का गलती भेल
दंड भेटबेक चाही
उचिते छैक
ऐना फेर नईं होअय
ताहि लेल दरखास सरकार
खीच लिय' हमर अंतड़ी
आ -
फ़ोड़ि दिय' आँखि
यऊ मालिक
बड़का गलती भ' गेल....

मनोज
सिकंदराबाद
१९/०७/२०१०

Sunday, July 18, 2010

नीक लगइए...

रौद बड्ड तेज छैक
प्रचण्ड गर्मी
गाछ तर बैसि जाइत छी
मुदा, छाहरियो में ताप छैक
सब किछु निःशब्द/निष्प्राण
ऐना मे
बाट भटकि क' अबैत सन
मिसियो भरि बसात
नीक लगइए...

भोरे भोर
सब दीन पहिल काज
उनटबैत छी अखबारक पन्ना
(हिस्सक लागि गेल अछि बुझाइए)
आद्योपांत पढि जाइत छी
मोन तीत .......
मारि-काटि/लूट-पाट
छीना-झपटी/ राज-पाट
झगडा-झांटी / गोली-बारी
गोल-गोलैसी/ गारा-गारी
हे! सत्ते.....
मोन तीत भ' जाईए
ऐना मे
कतहु एकात मे
विज्ञापनहुं में बिहुंसैत लोक
नीक लगइए...

चारु कात
सब दीस
बहि रहल अछि निरंतर
नोटक सप्त सिन्धु ...
आ,
चारु कात
सब दीस
जरि रहल अछि निरंतर
निर्धनक लहास
(ई पाई कोना मनुक्ख के चीन्हैत छैक भाई?)
बड्ड नोर भरल अछि आँखि में
ऐना मे
कतहु नुका क'
भरि मोन कानब
नीक लगइए...
बड्ड नीक लगइए...



मनोज
सिकंदराबाद
१८/०७/२०१०