Saturday, February 28, 2015

फगुआ


आइ तँ
हवो लगैत अछि
किछु भसिआयल सन
बहकैत सन बहैए
एम्हर-ओम्हर
लुढ़कैत-खसैत-पड़ैत..

रंग-रूप सेहो छैक आइ
बेस रंगायल सन
उचिते छै
बसात संग मिज्झर
आबारा उड़ियाइत जतय-ततय
रंगेक तँ बोली छै
आइ सब क्षम्य
आइ रंगपर्व होली छै..

आइ कोनो रंग पर
ककरो एकाधिकार नहि
ने लाल पर
ने हरियर
ने केसरिया, आ ने
उज्जर की पीयर पर
आइ सबहक सब रंग पर अधिकार
रंग मे मिज्झर रंग
रंग मे मिज्झर लोक
आइ बस अगबे
मदमत्त मनुक्खक टोली छै
आइ सब क्षम्य
आइ रंगपर्व होली छै..

ओना आइ तँ मात्र
आधिकारिक रंगोत्सव छैक
धरि एकर बादहु होइत रहतैक
सभ दिन रंगक खेल..

अनवरत बदलैत रहत
चढ़ैत उतरैत रहत
हमरा-अहाँ-हुनका सन लोक पर
तरह तरह के रंग
ककरो आँखि सँ, आ
ककरो छाती सँ खसतै रंग
ककरो धिया-पुताक छिपली सँ उड़ि
ककरो जेबी मे जा पैसतै रंग
ककरो हाथ पर रक्तरूप चढ़ि
चढ़ले रहतै रंग
ककरो सींथ सँ उतरि
उतरले रहतै रंग..

एह, देखू ने!
आइ केना बहकल अछि कवि
किदन-कहाँदन बड़बड़ाइए
धन्य छैक धरि भाग्य एकर
साफ निकलि जाएत बचि क'
बहन्ना लेल वैह
पीसल हरियर गोली छै
आइ सब क्षम्य
आइ रंगपर्व होली छै...

हैदराबाद
२८/०२/२०१५

उलहन


धुर केहन बड़द सन मनसा
हमरा देलैं ताकि गे
नहि बाजै छै अप्पन भासा
जीह गेल छै पाकि गे..

ढउआ कैंचा हम की करबै
हमरा लेल बलाय गे
भरि पिरथी पर कयो नहि भेटलौ
माटिक पूत जमाय गे..

जे नहि पुजतै माय के अप्पन
हैत ने हम्मर साँय गे
माँ मैथिलीक सुच्चा पूतक
संग बान्हि दे माय गे

हैदराबाद
२३/०२/२०१५

गिद्ध


मोसि मे
मिला देल गेल
मारिते रास संदेह
अवरुद्ध भेल
सहज प्रवाह सहजहि..

शब्द सभ कोंकिआइत
अटकल रहल
कलमक कण्ठ मे
हाक्रोस करैत
काल कोठरी मे बन्न
दम तोड़ैत..

मौन अछि लेखनी
कागत अछि स्तब्ध
बैधव्यक रंगहीनता ओढ़ने..

माछी भनभनाइत
रचनात्मकताक लहास पर
गाछ पर लुधकल
निसान सधने गिद्धक हेंज..

भोज हेतै आइ फेर
साहित्यक डीह पर...

हैदराबाद
२५/०२/२०१५

Monday, February 23, 2015

लाज


कोना हँसतै हमर भाखा जँ घर मे मान नहि भेटतै
कोना जीतै हमर बोली जँ तन मे प्राण नहि रहतै

बहै छै सभ दिशा देखू ने सगरो रक्त मायक अछि
कोना बचतै एकर जिनगी जँ पूतक ध्यान नहि रहतै

उधेसल केश, सतबै दर्द सउँसे देह नस-नस मे
कोना कटतै अन्हरिया आ दिया बाती कोना बरतै

रहय आँचर जकर झँपने सदति संततिकेँ दुर्गति सँ
तकर तीरल करेजाकेँ कहू ने लाज के रखतै

पजारल चूल्हि अछि पझबैत माटिक पूत-धी सभतरि
कोना सधतै ई माटिक ऋण आ मायक नोर के पोछतै

कोना हँसतै हमर भाखा जँ घर मे मान नहि भेटतै
कोना जीतै हमर बोली जँ तन मे प्राण नहि रहतै

हैदराबाद
२३/०२/२०१५

शब्दजाल


भरि मोन कानू
भुखले जाउ सूति
सहि लिय' सभ वेदना
नोर पीने जाउ..

धरि एक निवेदन राखू
शब्दजाल मे नहि ओझराउ!

शब्दक ओझराहटि
बड्ड भयंकर
मलाहक जाल सँ
भने निकलि जाय
छटपटा क' माछ
मुदा शब्दजाल सँ त्राण
असंभव
कतबो छटपटओने
जलहु भेटब दुरूह..

तैं कहैत छी
कतबो बहय सोनित
केहनो हुअय कष्ट
सब सहने जाउ
सब बहने जाउ..

धरि ई निवेदन राखू
शब्दजाल मे नहि ओझराउ
किन्नहु नहि...

हैदराबाद
२३/०२/२०१५

Sunday, February 22, 2015

गंगास्नान

हमर जन्म आ मृत्यु
दुनू भेल
मायक कोखि मे
जैह अनलक
सैह ल' गेल..

जाइ छी
पुछबनि विधाता सँ
किए पठेलहुँ
ऐना अनेरे
देखू ने
माय सँ
भ' गेल छल स्नेह..

ताबत अहाँ सब
हमर एक काज
क' देब?

सुनने छी
निष्कलंकित करैत छथिन
माँ गंगा
त' एक लोटा गंगाजल
ढारि देबनि हुनका पर
जे हमर रक्त मे
विसर्जित केलनि
अपन पितृभावकेँ?

हमर सुखायल कण्ठ
कने भीज जाएत
मरियो क'
कने जीबि लेब
कहू ने
हमर ई काज
क्यो क' देब?

हैदराबाद
२२/०२/२०१५

Saturday, February 21, 2015

सप्पत


नहि आएल करू अहाँ
हमर स्वप्न मे
किए अबैत छी?

कहने त' छी
अहाँक ई
अन्हार गुज्ज राति मे
सुसुप्त चेतना मे पैसि
स्मृतिकेँ झिकझोरि
एना अनर्गल चौल करब
भ्रान्तिक जाल मे गछारब
नहि सोहाइत अछि हमरा
बिसबिसाइत अछि..

आ इहो त' बुझले अछि
नहि नीक लगइए हमरा
देखि क'
क्षत-विक्षत स्वप्नक लहास
अपन ओछाओन पर
भोरे भोर..

नहि आएल करू एना
हमर स्वप्न मे
सप्पत दैत छी...

हैदराबाद
२१/०२/२०१५

सर्जक

कवि जी!
किए रचै छी?

कलमक धोधि मे
मोसि भरै छी
आ एमहर
अपनहि उदर टटैल..

औ जी!
किए रचै छी?

लोकक हिय के
सरस करै छी
आ देखू
अपनहि हृदय सुखैल..

धुर जी!
किए रचै छी?

सबहक मन मे
दीप लेसै छी
आ सदिखन
अपनहि चूल्हि पझैल..

मर जी!
किए रचै छी?

जन-मानस केँ
पथ देखबै छी
आ बूझू
अपनहि बाट घेरैल..

कवि जी!
किए रचै छी?

हैदराबाद
२१/०२/२०१५

Thursday, February 19, 2015

अवसान

एह!
नहि कानू अनेरे
उठू
हँसै जाउ
आनन्द मनाउ..

ई हम कहाँ?
ई तँ अछि हमर
गन्हाइत मैल गुदड़ी
जे नहि राखि सकल सम्हारि
औनाइत प्राणकेँ
नीके भेल
आब पहिरब न'ब नूआ
सुन्नर / चकाचक..

एह!
नहि कानू फुसिये
उठू
गीत गबै जाउ
उत्सव मनाउ...

हैदराबाद
१९/०२/२०१५

सद्यः स्नाता

थम्हू
फराके रहू
डेग नहि बढ़ाउ
ल'ग नहि आउ..

ई हम नहि छी
जकरा अहाँ
नोचि-खसोटि
रक्त बहायब
मदान्ध भ'
नाचब/गीत गायब..

ई अछि हमर
ठुट्ठ लहास
त्यागि देल
पुरना आवास
किछु क' लेब
नहि बहत आब रक्त
नहि देत आब कोनो
निर्मम आनन्द..

आइ बहुत दिन पर
अन्ततः
हमर ई देह
नहा क' पबित्र अछि भेल..

तैं सुनू
फराके रहू
डेग नहि बढ़ाउ
ल'ग नहि आउ...

हैदराबाद
१९/०२/२०१५

Wednesday, February 18, 2015

रिक्सा

काल्हि तक रहै
जे निहुरल मूड़ी
से आइ कने
सोझ छै
धसल सीना
आइ कने
तनैल छै..

अपन घाम सँ
पटबैत रहल निरन्तर
छौंड़ीक भविष्यक भूमि
छींटैत रहल ओकरा लेल
संस्कारक बीया
खींचैत रहल मनुक्ख के
तीन चक्का पर
ऊर्जा लैत रहल
छौंड़ीक अद्भुत मेधा सँ..

छौंड़ी भेलैए आई
बड़का हाकिम
धियाकेँ कहलकैए
माथ ठोकि
खूब असीरबाद दैत
हाकिम भेलैहें
धरि हाकिम नहि होइहें
मनुक्खे रहि
मनुक्खक काज करिहें
गे बौआ..

कान्ह परहक गमछा सँ
आइ घाम कम
आँखि बेसी पोछैए
अभिमानक भान छै
गौरवक बोध छै
धरि उड़ैए नहि ओ
अकास मे
पैर दुनू औखन छै
रिक्साक पैडिल पर..

घूमि रहल छैक चक्का
ल' जा रहल छैक
आगू दिस
बेस फुर्ती सँ...

हैदराबाद
१८/०२/२०१५

प्रतिबिम्ब


सूति-उठि क'
भोरे-भोर
भेंट होइत अछि
अएना मे
एक अपरिचित..

कौखन
बुझाइत अछि
किछु चिन्हार सन
सद्यः स्नाता शिशु-इजोत मे
किछु अनटोटल
मिझाइत अन्हार सन...

हैदराबाद
१८/०२/२०१५

Saturday, February 14, 2015

शुभकामना

कहलखिनहें
नबका सरकार
भ्रष्टाचार सँ
मुक्त हएत प्रदेश
बड्ड सुन्दर बिचार
बड्ड दीब सन्देश..

यौ सरकार
कने बिचारू
बूझू लोकाचार
जतय मुफ्तखोरी सँ
बनै छै
बिगड़ै छै, आ
बदलै छै बिचार
ततय सँ कोना जेतै
सबल भ्रष्टाचारक
शाश्वत शिष्टाचार
कोना डोलतै
जड़ि जमओने
पारंपरिक दुराचार..

तैयो
लागल रहू
करैत रहू
अनुपम प्रयास
किए छोड़ी आस?

देखी सब मिलि
की करैत अछि, आ
की की करबैत अछि
मङनीतंत्रक
उत्तेजित अवधारणा
सुफलित हुअय
अहाँक
सकल मनोकामना!

हैदराबाद
१४/०२/२०१५

Friday, February 13, 2015

खेल

चलू
साधू निसान
खेलू खेल..

हमर खोखड़ल हृदयक
दरकल आवरण
तीरि लिय'
आ देखि लिय'
अपनहि आँखि सँ
किछु अद्भुत भग्नावशेष

देखू
आ करू तय
की अछि बेसी जीर्ण
हमर खोंटल हृदय
आ की ओकर
विदीर्ण आवरण!

आउ
लगाउ दाओ
खेलू खेल...

हैदराबाद
१३/०२/२०१५

Thursday, February 12, 2015

सींथ


हमरहि सन ओ
ओकरहि सन हम
अनमन ओकरहि सन..

हमरहि सन स'ख-मनोरथ
स्वप्न-कल्पना-कामना
प्राण मे तरंग
जीबैत रहबाक उमंग
सब किछु हमरहि सन
अंतर बस एतबे -
ओकर विश्व झरकल छै
ओकर सींथ उजड़ल छै..

नीक लगै छै ओकरो
हमरहि सन
जीवनक सब रंग
जिनगीक सब राग
चिड़ै-चुनमुनिक गीत
सृष्टिक मधुर संगीत
फूलक मृदु संवाद
तरल माछक स्वाद..

चूड़ीक खनखन
पैजनियाक छमछम
ललाट मध्य पूर्णचंद्र
सेनूरक लाल रंग
अस्तित्व मे गाँथल मान
ठोर पर सरल मुस्कान
सबटा अनुराग
हमरहि सन..

अंतर बस एतबे
ओकर साँस ठहरल छै
ओकर सींथ उजड़ल छै...

हैदराबाद
१२/०२/२०१५

Wednesday, February 11, 2015

संत्रास


हाथ पकड़ने माथ, कहू ई केहन शहर छै!
सगरो झंझावात, कहू ई केहन शहर छै!

जगमग राति दिवस अन्हारमय
समय लगओने घात, कहू ई केहन शहर छै!

आस-भरोसक चिता जरै छै
टटा रहल छै आँत, कहू ई केहन शहर छै!

सिहरि क' मरि गेल जाड़ प्रकोपे
सड़क फेकायल कात, कहू ई केहन शहर छै!

मनुखे मनुखक माउँस तीरैये
मानवता भेल मात, कहू ई केहन शहर छै!

शून्य चेतना, शून्य वेदना
संत्रासक आघात, कहू ई केहन शहर छै!

नुका रहल छै बात, कहू ई केहन शहर छै!
छेका रहल छै हाथ, कहू ई केहन शहर छै!

हैदराबाद
११/०२/२०१५

पासा


सत्ताक राजनीति मे
बहुतो रास खेल
चलै छै
चलिते रहै छै
मोन डोलै छै
कुर्सी डोलै छै..

कौखन
कुर्सी पर
बैसाओल जाइत छै
कौखन
कुर्सी सँ
खसाओल जाइत छै
मोन हुलसै छै
मोन झुलसै छै..

कौखन
प्राणनाथक सम्बोधन
कौखन
प्राणघातक उद्घोषण
कएल जाइत छै
आगि दहकै छै
आँखि फड़कै छै..

अहिना होइ छै
होइत राहलैये
होइते रहतै
ओमहर सगरो
लोक कनिते रहतै
भीख मंगिते रहतै
एमहर सगरो
खेल होइते रहतै..

कौखन गुड़कै छै
कौखन अटकै छ
सत्ताक राजनीति मे
पासा उनटै छै
पासा पलटै छै...

हैदराबाद
११/०२/२०१५

Tuesday, February 10, 2015

प्रजातंत्र


जनतंत्रक मुख्य अखाड़ा मे
अधिकार-शक्ति केर प्रांगण मे
आङ्गुर पर चेन्ह लगैत रहल
कयो धोआ गेला क्यो पोछा गेला

सभ बाट-घाट चौराहा पर
भीतर-बाहर घर आँगन मे
बुधियारिक ढेका फुजैत रहल
क्यो नुका गेला क्यो देखा गेला

जनाधिकार केर महाकुम्भ
नित लोहछल लोकक मेला मे
शोषण केर खुट्टा खसैत रहल
क्यो धरा गेला क्यो पड़ा गेला

निर्णय-स्थल जनमानस केर
पाखंडक डीह-घराड़ी मे
भोटरक बुलडोज़र चलैत रहल
कयो लेढ़ा गेला क्यो धंगा गेला

थरथरैल दंभक पहाड़
चहुँदिस सब गाम-नगरिया मे
थेथरइ केर कोठा ढहैत रहल
क्यो नुका गेला क्यो बिला गेला

संविधान केर प्रबल तेज
धधकल-पजरल जनमानस मे
गणतंत्रक अन्हड़ बहैत रहल
कयो बहा गेला क्यो दहा गेला

कयो फेका गेला क्यो फेंटा गेला
क्यो सुखा गेला क्यो टटा गेला..

Monday, February 9, 2015

बिसबिस्सी


नेनपनक  किछु स्मृति
कहाँ बिसराइत छैक
रहिए जाइत छैक, आ
बड्ड बिसबिसाइत छैक..

जेठक दुपहरी मे
खेत जोतैत छल
केहन सान सँ हरबाह
स्वेद-स्नान क' भीजल
दिव्य लगै छल
मुदा एक्कहु बुन्न पानि
कहाँ देलक मुँह मे
रोजा छलै ने!

क्षितिज पर डूबैत
सिनुरिया सूर्यक संग
उठलै अजान
बिदा भेल बड़द हंकैत वीर
आ पछोर धेलहुँ हम
हरबाहक आँगन दिस
रोजा फुजितैक ने!

खूब खेलक हरबाह
आम-चूड़ा गूड़ि-गूड़ि
हमहूँ खेलहुँ खूब
गमगमाइत मालदह आम
भरि पोख खा
बिदा भेलहुँ गाम
पछोर देलक हरबाह
बड़द हंकैत..

हमरा सँ पहिनहि
पहुँच गेल छल दलान पर
हरबाहक मालदह आमक गमक..

ओकर गत्र-गत्र पर पड़लै
बेंतक असंख्य निसान
आ हमर हिस्सा आएल
बामा गाल पर
लाल बाबाक पाँच आङुरक छाप..

हमर गाल परका, आ
ओकर देह परका
मिटा गेल सब निसान समयानुसार
मुदा करेज पर पड़ल निसान
रहिए गेल अक्षुण्ण
अछि औखन बिसबिसाइत
ओकरो रहिये गेल हेतै..

चल गेल हरबाह
चल गेला लाल बाबा
मुदा ओइ दिनका निसानक पाठ
रहि गेल मोन
सिखा देलक बहुत किछु
आर जे होइ
धरि नहि हएब बाबा सन काठ
मनुक्ख मे देखब
हँसैत बजैत
सांस लैत
अगबे जीबैत मनुक्ख..

बस एतबे कामना
आर जे भ' जाय
धरि एहि करेजक
बिसबिस्सी टा नहि जाय...

हैदराबाद
०९/०२/२०१५

अधिकार


।। अधिकार ।।

हम की कहलहुँ नहि कहलहुँ से छोड़ू ने
अपने धरि की की बुझलहुँ से बाजू ने

ककरा घर मे की रहलै से छोड़ू ने
अप्पन घर मे की बाँचल से ताकू ने

ओकर हाथ मधूर कोना से छोड़ू ने
अपने घोरु अपन जिलेबी छानू ने

ओकरा की भेटलै नहि भेटलै छोड़ू ने
अप्पन हक अइ अपने मुँह सँ मांगू ने

अनकर कोठली कोना बनल से छोड़ू ने
अप्पन माटिकेँ अपने घाम सँ सानू ने

के की अनलक कोना क' अनलक छोड़ू ने
अप्पन अँगना अपनहि भाखा आनू ने

हम की कहलहुँ नहि कहलहुँ से छोड़ू ने
अपने धरि की की बुझलहुँ से बाजू ने

हैदराबाद
०९/०२/२०१५

छटपटाहटि


ओहि दिन
सोनितायल भगवतीस्थान मे
नोरायल आंखिये
पूछि देने रहय छौंड़ा
आ हम भेल रही निरुत्तर
औखन छी निरुत्तरे..

"भगवतीकेँ पसिन्न छनि
काटल छागर
तँ किएक नहि रखलखिन
अपनहि लग?
किए पठौलखिन एतय?
कते छटपटेलै!
कते दुखेलै!"

सोनितायल भगवतीस्थान मे
दू खण्ड भेल
छागरक छटपटाहटिक
तँ भेलैक अन्त
मुदा आरम्भ भेल
हमर छटपटाहटि
जे चलि रहल अछि
अविराम औखन...

हैदराबाद
०९/०२/२०१५

अलकतरा


शहरक ई सड़क
अलकतरा सँ नीपल
सोखि रहल
तमसायल सूर्यक अग्निकिरण
तपि रहल अछि
गलि रहल
चिपचिप अलकतरा

हम दौग' चाहैत छी
मुदा सटि जाइत अछि चट्टी
घमैत अलकतरा मे
खसि पड़ैत छी हम
मुँहे भरे
निपा जाइत छी हमहूँ
अलकतरा सँ
पोता जाइत अछि कारी अन्हार
सगरो

आन्हर शहरी दौड़
ई कारिख पोतने शहर
अहिना दौगबैत रहत
अहिना खसबैत रहत
अहिना हमर मुँह पर
कारिख पोतैत रहत

कतबो घाम, आ की
कतबो झहरैत नोर
धो सकत कहियो
मुँह पर लागल
ई शहरक पोतल अलकतरा?

हैदराबाद
०९/०२/२०१५

रंगोत्सव


कार्यालयक स्वर
साहेबक बजाहटि
ठोस निर्देश
विभागक क्रियाकलापक
मासिक विवरण
भ' जएबाक चाही तैयार
तुरत्ते..

घरक स्वर
गृहस्वामिनीक आदेश
बजारक काज पड़ले अछि
चाउर-दालि-नोन-तेल
सब निङघटल अछि
आबि जएबाक चाही सब
तुरत्ते..

अन्तरात्माक स्वर
अनाथालय सँ
आयल अछि पत्र
आबि रहल छैक रंगोत्सव
धिया-पुता लेल रंग किनबाक ब्योंत
हमर सहयोगक अपेक्षा
मुदा पत्र मे
कहाँ कतहु लीखल छैक
ओ इंधनयुक्त शब्द - 'तुरत्ते'
तैं, देखल जेतै
कहियो फेर..

एखन अछि आरो
रंगहु सँ बेसी आवश्यक
मारिते रास रंगहीन काज...

दर्शन


धुर जी!
किए अनेरे
अपस्याँत छी भेल
जे ताकि रहल छी
से नहि भेटत
जतय तकै छी

सुनू कहैछी
बड़का रहस्य

जिनगीक गूढ़तम दर्शन
बहुधा
पाओल जाइछ
सुबकैत -
रद्दी बेचनिहारक
आगाँ मे,आ
बिहुँसैत -
टेम्पु-ट्रकक
पाछाँ मे

की?
बुझलियै किने?

हैदराबाद
०८/०२/२०१५

Sunday, February 8, 2015

जनादेश


खंड-खंड काटि क'
खंड-खंड बँटैल
खंड-खंड भूजि क'
खंड-खंड रन्हैल

खंडित विश्वास अछि
खंडित अछि आस
खंडित आभास अछि
खंडित अछि साँस

एक खंड देह अछि
खंड-खंड प्राण
एक खंड माथ मे
खंड-खंड ज्ञान

खंड-खंड जीवनक
खंड-खंड शेष
खंडित जनतंत्र केर
खंडित आदेश!

हैदराबाद
०७/०२/२०१५

स्वप्नलोक


साँचक माथा पाग रहै तँ कहबे की!
सुग्गा अपनहि बात कहै तँ कहबे की!

फूसिक चीनी मीठ लगै छै हाकिम के
सत्य गुड़ीचक मधुर लगै तँ कहबे की!

मुइला पर मे भोज हेतै रसगुल्ला के
जिबितो मे किछु मान भेटै तँ कहबे की!

भङठल प्रेमक मोन परै छै छौंड़ा के
बुढ़िया मायहु मोन परै तँ कहबे की!

मान किसानक बिका रहल चौबट्टा पर
धान किसानक बिका सकै तँ कहबे की!

धर्मक ठेकेदारी छै जकरा सभ के
मोनहु मे भगमान रहै तँ कहबे की!

साँचक माथा पाग रहै तँ कहबे की!
सुग्गा अपनहि बात कहै तँ कहबे की!

हैदराबाद
०६/०२/२०१५

Sunday, February 1, 2015

उत्पात

समयक विशाल चक्र
दुराचारक कुचक्र
चलबे करतइ
चलिते रहतइ
तैं की?

विश्वास त्यागि
न्याय-विवेक सँ भागि
बैसि रहत
ठुट्ठ गाछक त'र?
मौसमक सङोड़ मे
पतझड़हु छै
तैं की?

अंतर्मन मे
झरकक कोलाहल
ह्रदय सँ झहरैत
सिनुरिया घाम
शीतल पुरबाक आस मे
कर्मठ रहत
बेस रौदी छै
किछु दिन लेल
ग्रीष्मक कुठाराघात छै
तैं की?

ओ बाझल अछि
माटिपानिक सेवार्थ
लागल अछि
इतिहासक उर्वर माटि खोदि
भविष्यक गाछ रोपय मे
किछु टांग-खिचनिहार छै
बानरक उत्पात छै
तैं की?

हैदराबाद
०१/०२/२०१५

पुनरावलोकन

हे देखियौ
ई छौड़ीक चालि!
नास क' देलक
कविताक पोथी के
रंगीन पिलसिन सँ
दकचि देलक
पन्ना सब
फाड़ि-चीर देलक
हे सरस्वती
सब सत्यानास..

थम्हू थम्हू..
नहि नहि!
सत्यानास नहि
ई त' भेल आर दीब
आर सजीव
आह, अद्भुत!

बेरंग कागत पर
कारी आखरक मलिन पाँति
क्लांत-कलुषित पद
निष्प्राण पृष्ट संयोजन
भ' उठल अछि
अनायसहिं
कते रंगमय
कते जीवंत..

फाटल पन्ना
सम्पादित क' काव्य केँ
बना देने अछि
कतेक परिपूर्ण
कतेक सम्पूर्ण..

समर्पण पृष्ट के
कने फाड़ि क'
हमहूँ दकचि दैत छियै
रंगीन पिलसिन सँ
अपन सरस्वती-
अइ छौड़ीक नाओं..

यैह!
आब भ' गेल
आखर-पाँति-पद-कविता
सरिपहुं दीर्घायु
कालजयी....

हैदराबाद
०१/०२/२०१५