Friday, January 30, 2015

सुरुजक छाहरि मे


दुनू बड़द सँ
गप्प करइए
गीत गबइए
धरती केँ
नबका हरियर नूआ
पहिराबय लेल
तैय्यार करइए
एकाग्र-चित्त
खेत जोतइए


माटि पर
हमर हस्तरेखा गढ़इए
हमर अन्नदाता
तैय्यार करइए
हमर जीवित रहबाक
सबसँ पैघ अवलंब
उदराग्निक हविष्यान्न
देहक झहरैत घाम सँ
सिक्त करइए माटि के
माटिक पूत

आनंद मग्न
सृजनकर्म मे व्यस्त
केहन तहन रौदी
केहन तहन धाह
धुह!
ओ की डरत ताप सँ
जे जीबइए
सीना ठोकि क'
सुरुजक छाहरि मे...

घाम

लगइए
हवा किछु बदलि रहल अछि
कनकनी कने कमलइए
कखनो काल
घामक किछ बुन्न सेहो
अभरि जाइत अछि कपार पर
बदलि त' रहल छैक किछु
निश्चित..

सुनलियइए
अपन आत्मसम्मान पर
ककरो अनर्गल स्पर्श होइतहि
एक वीरांगना
थपड़िया देलकइ मनसा के
बीच बजार मे
सार्वजनिक प्रत्याघात
तत्काल..

सुनलियइए
सुनैत रहैत छी
बीच-बीच मे
भ' रहल छैक पलटवार
सरिपहुँ..

ठीके
हवा बदलि रहल छैक
घामक किछु बुन्न
अभरि रहल छैक
सभतरि...

हैदराबाद
३०/०१/२०१५

Wednesday, January 28, 2015

सुबकैत खंडहर

तहिया
गाछ-बिरिछक युग मे
मनुक्खो
फलैत-फूलैत छल
साँस लइत छल
छाँह दइत छल..

आब
कोठा-मकानक युग मे
मनुक्खो
रंग ओढ़ैत अछि
रंग छोड़ैत अछि
दराड़ि उभरै छै
नींव डोलै छै..

आ फेर
मनुक्खो
बनि जाइत अछि
अपनहिं इतिहास सँ गछारल
अतीत दीस तकैत
सुबकैत खंडहर...

हैदराबाद
२८/०१/२०१५

Tuesday, January 27, 2015

दुलार


किछ संबंधक
समीकरण
होइत छैक
बड्ड बिचित्र..

छोटकी
बड्ड तंग करैछ
पितामही केँ
एह!
एक्काहु क्षण
चैन नहि..

आ जखन कखनहुँ
फराक होइछ दुनू
तखन
मोन लगैत छैक
ने एकरा
तंग करय मे
ने ओकरा
तंग होमय मे...

हैदराबाद
२७/०१/२०१५

मोजर


आइ अकास कने
फरिच्छ भेल अछि
सूर्यदेव
नीलाभ पृथ्वी केँ देखि
बहुत दिनक बाद
प्रफुल्लित छैथ..

अहि अन्हारमय ब्रह्माण्ड मे
के छन्हि आर संसार मे
मोजर करय बला!

जीर्ण-शीर्ण भेल
नीलाभ पन्नीक तर
संसार बसओने
जीर्ण-शीर्ण भेल
किछ मनुष्यवत जीव सेहो
बहुत दिनक बाद
प्रफुल्लित अछि
सूर्यदेव केँ देखि..

अहि माघक ठिठुराघात मे
के छैक आर संसार मे
मोजर करय बला!

हैदराबाद
२७/०१/२०१५

Monday, January 26, 2015

लोथरा


नञि चिन्हलहुँ हमरा?
आह! कोना चीन्हब
कहाँ पड़ल हमरा
कोनो नाम
अस्तित्वक निर्माणक पहिनहिं
पहुँच गेलहुँ एतय
मुंसिपाल्टीक
कचराक डिब्बा मे
कोना चीन्हब!

नञि नञि!
आत्मग्लानि उचित नञि
वितृष्णा होइछ
से तँ उचिते
मनुक्ख नञि ने छी
हम तँ छी मात्र
वीभत्स माउंसक लोथरा
अशुद्ध / असिद्ध / अनिष्ट
जन्म सँ पहिनहिं
घोषित अवांछित

प्राण?
गेल हएत
हम किजानि गेलियइ
प्राण की होइत छैक
से बुझबाक समय
भेटितय तहन ने!

कथीक दुःख?
भरि जिनगी / प्रतिक्षण
भोगितहुँ नारी-पीड़ा
से एकहि बेर
जे भेल से भेल
नीके भेल
अहाँक संसार मे
कुहरब सँ पहिनहिं
बना देल गेलहुँ
मोचरल कोखिक उपजा
सहजहिं मुक्त!

हैदराबाद
२६/०१/२०१५

चैन सँ

हाथ काटू चैन सँ
बात काटू चैन सँ

पाँच बर्खक मत भेटल अछि
घेंट काटू चैन सँ

दिन भरिक डाका सँ थाकल
राति काटू चैन सँ

देस जरि सुड्डाह भ' जाय
फोंफ काटू चैन सँ

बुझि बपौती, मातृभूमिक
जड़ि काटू चैन सँ

मिट्ठ सोनित छै मनोजक
दाँत काटू चैन सँ

हैदराबाद
२६/०१/२०१५

Sunday, January 25, 2015

सुता-संकल्प

हे हमर पिता
धन्य छी अहाँ
चकित छी हम
देखि क' अहाँक
संयमक अथाह सागर
की छैक एकर स्रोत
कहाँ छैक एकर अंत
भ्रमित छी हम
धन्य छी अहाँ
हे हमर पिता!

अपस्याँत भेल अहाँ
कइएक बर्ख सँ
हमरा बुझने
कइएक कल्प सँ
की अछि विवशता
हे हमर पिता
की तकैत छी अहाँ
ककरा तकैत छी
आक्रोश अछि हमरा
किए तकैत छी
व्यर्थ अछि ई
अहाँक सतत साधना
प्रदूषित जान-समाज सँ
विलुप्त भ' रहल अछि
ओ निर्बल प्राणी
जकर संधान मे
छिछिआइत छी
कइएक बर्ख सँ
अपस्याँत भेल अहाँ

याचना अछि हमर
अंत करू आब
एहि यंत्रणा के..

सुता छी अहाँक
कोनो विवशता नहि
नहि अछि स्वीकार्य हमरा
बनब अहाँक यंत्रणक मूल
नहि अछि प्रयोजन
किनबाक हमरा लेल
पुरुषक आकृति मे
नरभक्षी पशु
जकर सामीप्य-मात्र सँ
मरैत रहब हम
प्रतिदिन-प्रतिक्षण-बारम्बार
जीबय दिय'हमरा
हे हमर पिता!

संकल्प अछि हमर
नहि करब हम अर्पित
अपन सर्वस्व
बिकाऊ पुरुखक हाथ
विदेह छी अहाँ
वैदेही छी हम
प्रतीक्षा करत हमर वरमाल
ओहि श्रीरामक
उठा क' ध्वस्त करता जे
परिपाटीक शिव-धनुष
हे हमर पिता
संकल्प अछि हमर..

राँची
०९/०७/२००२

करू न'ब श्रृंगार

आउ हे सजनी
करू न'ब श्रृंगार

चलू देख ली
अही आँखि केर
नवल दृष्टि सँ
केहन दिव्य सन
लागि रहल अछि
यैह विश्व-संसार

जुनि पहिरू
ओ नबका नूआ
यैह ठीक अछि
फाटल-चीटल
चेफरी साटल
ओढ़ि लिय' बस
एकरे पर सँ
लाजक ओढ़ना
जे फेकल अछि
चहुँदिस त्यागल
नव समाज केर
दुहिता सभ सँ

जुनि लगाउ प्रिय
कमलनयन मे
करिया काजर
रहय दियउ ने
नीक लगइए
लगा लिय' बस
एहि नयन मे
धाख बुजुर्गक
मान समाजक
जुनि लगाउ प्रिय
कमलनयन मे
हे मृगनयनी
करिया काजर

जुनि लेपू
अहि पुष्प-अधर के
मिथ्या-कृत्रिम
लाल रंग सँ
ओढ़ने जे छी
लाजक ओढ़ना
ओही सत्य सँ
अरुण भेल अछि
ठोर अहाँके
दीब लगइए
आह कामिनी!
जुनि लेपू
अहि पुष्प-अधर के
मिथ्या-कृत्रिम
लाल रंग सँ

बाह मानसी!
एहि श्रृंगार मे
मान भरल अछि
शिष्टाचारक
रंग चढ़ल अछि
देख लिय' जे
ओही आँखि केर
नवल दृष्टि सँ
केहन दिव्य सन
विश्व वैह ई
लागि रहल अछि

आउ हे सजनी
नव श्रृंगारक
संग बनाबी
सुंदरता केर
नव परिभाषित
चलू हे सजनी
बाट बनाबी

राँची
२०/०७/२००२

पेटझर्री

अजगुत ताल-तमासा देखल
नित्तः पेट झरइए
कतबो गोटी-पाचक खएलहुँ
किछु नहि आब पचइए

चौथा फेल मिनिस्टर देखू
शासन के चलबइए    
 सरकारी अधिकारी सब सँ
तरकारी रन्हबइए

बिन लक्ष्मी गृहलक्ष्मी बारल
ई की ताल  करइए
दू कौड़ी के छौंड़ा देखू
लाखक बाट जोहइए

गामक पढ़ुआ नबतुरिया सब
शहरक बाट धरइए
नानी सँ सूनल खिस्सा केर
नढ़ेया मोन पड़इए

अनकर कोठा ठाड़ करइ  छी
अप्पन घर खसइए
रघुपति पोथी मे भुतियायल  
रावण राज करइए

अप्पन भाषा त्यागल मैथिल
हिन्दीक  ठाड़ी  पङइए
किसुनभोग केर गाछ मे देखू
अल्हुआ आब फरइए

सबटा ताल-तमासा देखल
तैं त' पेट झरइए
कतबो गोटी-पाचक खएलहुँ
किछु नहि आब पचइए


राँची
०२/१०/२००२

पाहुन

।। पाहुन ।।

भारत!
एक सुपरमार्केट
आधुनिक विश्व-बजार
आउ, करू व्यापार..

कोटि-कोटि लोक
ऋणक मोटगर गरदानी
पुष्पमाल जकाँ धारण कय
पंक्तिबद्ध ठाढ़ अछि
क'ल जोड़ने
चमकैत समान सँ ठूसल
सुसज्जित दोकानक समक्ष
अपन नंबर अएबाक
निरंतर प्रतीक्षा मे..

सुपरमार्केटक पछिला द्वार सँ
पैसि रहल अछि
गौरवर्ण व्यापारीक हेंज
दोकानदार के पँजियौबैत
हाथ मिलबइत
हँसैत/मुस्काइत..

कनिये फराक मे
मूक बधिर किछु लोक
मोन पाड़ैत
किछु बर्ख पहिलुक
लाल किला सँ देल
एक अचकनधारीक जयघोष
भौंचक्क भ' देखैत
बजारक आधुनिक खेल..

आइ फेर अएलाह अछि
मुकुटधारी व्यापारी पाहुन
वाशिंगटनक मालगाड़ी चलबैत
करबाक लेल
बजारक निरीक्षण
आ सुनबाक लेल
अपन गुप्त जयगान
लाल किलाक जयघोष मे..

नतमस्तक भ'
गीत गबैत जाउ
जयकार करइ जाउ
आबि गेल छथि आजुक
जन गण मन अधिनायक
पैसि गेल छथि
हमरा सबहक
सुसज्जित मोदीखाना मे...

हैदराबाद
२५/०१/२०१५

सन्दर्भ: बराक ओबामाक भारत आगमन

Saturday, January 24, 2015

भार

माथ पर
एक ढाकी पाथर लदने
चलि जाइत छलि ओ
निर्निमेष

मौलायल मुँहेंठ परहक घाम
उज्जर आँचर सँ पोछैत
जेना पोछि रहल हो
अप्पन नहि
हमरे मुँह पर लागल
कारी गन्हाइत कादो

उजड़ल सींथि
रंगहीन आवरण
गट्टा सुन्न
भीजल आँखि
सुखायल ठोर
दृष्टि/सांस/जीवन
सब किछु सुन्न

चलि जाइत छलि ओ
अंतहीन पथ पर
तबधल बालु के धङैत
निष्प्राण
माथक भितरका भार
बना देने सहज
माथ परहक बोझ केँ
तूरक फाहा सन

सद्यः पुलकित पुष्पक
वैधव्यक भार
समाजक कतबो विकसित
तराजू
तौलि सकलइए
आइ धरि?

हैदराबाद
२४/०१/२०१५

Friday, January 23, 2015

गोहार

हे माँ शारदे!
लिय' एक बेर पुनि
आबि गेलहुँ लय
एक आर निवेदन..

सदति भेटैत रहल माँ
अहाँक स्नेहल आशीष
अहिना भेटैत रहय
ई त' सतत याचना
करिते रहब..

ओना
अइ बेरुका निवेदन
किछु आर अछि
कने ध्यान देबहि
हे माते!

देखिते हेबइ
कहियो जे रहय हमर देस
ज्ञानक महासुमद्र, से
केना सुखा सन गेल अछि
अज्ञानक अन्हार
तेना ने छैक पसरल
जे फुजलो आँखि लोक
केना अन्हरा सन गेल अछि..

हे वीणावादिनी!
निवेदन अछि माँ
कने विराम दियौ
वीणा वादन केँ
आ उठाउ ज्ञानकोष
फुकियौ कोनो महामंत्र
फेरू अपन वरदहस्त
हमर देस पर
जे चमकय फेर
ज्ञानक इजोत सँ
लेसय पुनि सद्ज्ञानक दीप
हमर देस
अहाँक जम्बू द्वीप..

हे वाग्देवी
स्वीकार हो प्रार्थना
जागइ फेर सँ सबहक
सुसुप्त भेल चेतना
फोंफ कटैत संवेदना..

यैह हमर निवेदन
यैह हमर याचना...

हैदराबाद
२४/०१/२०१५

मुक्ति


बेस इजोरिया राति छलै
चंद्रकिरण झहरैत छलै
कनकन पछबा छल नाचि रहल
कटकट हाड़हु छल सिहरि रहल..

तँ एहने सन परिवेश छलै
आँखिक सोझा किछु चमकल छल
हम ठमकि गेलहुँ, हम सहमि गेलहुँ
कारी कटकट किछु सूझल छल..

किछु ल'ग गेलहुँ, तँ हे शंकर!
ओ छौंड़ा नङटे सिकुड़ल छल
ओस-स्नान सँ भीजल छल
तैं चन्द्रकिरण सँ चमकै छल..

श्वास बन्न, आभास बन्न
सूतल छल ओ चिर-निद्रा मे
संत्रास बन्न, अतिचार बन्न
उन्मुक्त गगन मे विचरै छल..

ओ नग्न मुक्त प्रस्थान केलक
किछु आर नग्न संसारहु भेल
हम्मर अपनहिं ई आँखि दूनू
हमरहु नङटे सन देखने छल

सब भाव सन्न, सब ज्ञान सन्न
मानवता केर उन्माद बन्न...

हैदराबाद
२३/०१/२०१५

नेताजी

एक नेताजी हुनको सन छल
जे मांगि रक्त देशक जन सँ
स्वराज हेतु संग्राम केलनि

एक नेताजी हिनको सन अइ
जे चूसि रक्त देशक जन केँ
निज स्वार्थ हेतु संधान करथि

अछि प्रश्न उठल जन-मानस मे
अछि शब्द वैह, धरि अर्थ नवल
'नेताजी' सन सम्बोधन पर
अधिकार हुनक की हिनकर छनि?

हैदराबाद
२३/०१/२०१५
नेताजी सुभाषचंद्र बोस जयन्ती पर उद्गार

युग

ओ अहाँक युग छल
स्वराजक स्वर्णिम युग
सौभाग्य छल अहाँक
जे अपन युगक नेतागणक चित्र
सजा सकलहुँ देबाल पर
पुष्पमाल चढ़ा..

ई हमर युग अछि
वस्तुतः असल कलियुग
हम नहि छी
अहाँ सन भागमान
सुनसान अछि हमर भीत..

कतहु कोनो कोन में
नोर चुअबैत
मौलाइत पुष्पहार
औखन क' रहल प्रतीक्षा
अपन सुपात्रक..

बुझबाक करू प्रयास
उन्नैस सय सैंतालिसक युग सँ
ए.के. सैंतालिसक युग धरि
बदलि गेल छैक
बहुत किछु
बिलटि गेल छैक
बहुत किछु...

हैदराबाद
२३/०१/२०१५

Thursday, January 22, 2015

नफा


सुनैत छी सभतरि
भिखमंगा सब
चलबैत अछि
फलैत-फूलैत
व्यवसाय
लागत नगण्य
नफा जबरदस्त!

होइत हेतैक
हाथ पाथब
फलैत व्यवसाय
फूलैत वाणिज्य
होइत हेतैक..

मुदा क्यों जँ बुझबितय
स्वजन सँ
आंकड़ जेना त्यागल
ई बुढ़ियाक पत्तल पर
हमर मुँह दूसैत
कहियोक रन्हायल त्याज्य अन्न
चाउर सँ बनल भात
आ, भात सँ पुनः
सुखा क'
भ' रहल चाउर
कोन व्यवसायक छैक
केहन जबरदस्त लाभ?

क्यों जँ बुझबितय
की छैक ई रहस्य
आधुनिक सबल भूखतंत्र के
त्रासदीक बेजोर पूंजितंत्र के...

हैदराबाद
२२/०१/२०१५

Wednesday, January 21, 2015

भूल

जहिया कहियो
केलहुँ समय कटबाक
आधारभूत भूल
वास्तव मे
हम समय नहि कटलहुँ
समय कटलक हमरहि..

जिनगी भेल
अनेरो
किछु आर व्यर्थ
किछु आर छोट..

समय काटब, आ
समयक उपयोग मे
अंतर छैक बड्ड
दुनू पृथक बात
जँ बूझि सकलहुँ
तँ जीत
जँ नहि बुझलहुँ
तँ मात...

हैदराबाद
२१/०१/२०१५

सृजन

हे कवि!
किए एहन अवसाद
किए बहैत अछि नोर
किए ऐना अवसन्न
किए व्यथा घनघोर?

धरू धैर्य
करू विश्वास
ई मानसिक दर्द
किन्नहु नहि अछि
व्यर्थ वेदना
दियौ ध्यान
ई थिक अहाँक
सुच्चा सृजन क्रीड़ा
कवित्वक प्रसव पीड़ा!

भ' रहल छैक जन्म
निश्चित
प्रबल नव-संवेदनक
प्रखर जन-साहित्यक..
आँखि सँ बहैत मोसि
बहरायत कलमक नोक सँ
चढ़त रंग बेजोड़
उज्जर कागत पर..

धैर्य धरू
बस किछु क्षण आर...

हैदराबाद
२१/०१/२०१५

वास्तविकता

देखि क'
ओ सब जे
देखैत छी
फूजल आँखि सँ
भ' जाइत छी
तेना ने भयाक्रांत
जे मोन होइत अछि
मुँह झाँपि क'
कोनो अबोध नेना सन
सूति रही चुपचाप
अन्हारक आँचर मे नुका..

मुदा सूति नहि पबैत छी
मुँह झाँपि क'
किएकी
अपनहिं सांसक धाह
आदंकी झरकक आघात सन
झुलसाबय लगैत अछि
आ, एना मे
मुनलो आँखि
किछु भयानक चित्र
देखाबय लगैत अछि
क' दैत अछि
बड़कइत घाम सँ
सराबोर..

कहाँ छोड़ैत अछि
निष्ठुर / डराओन
वास्तविकताक दैत्य
केहनो अन्हार मे
मुनलो आँखि मे...

हैदराबाद
२१/०१/२०१५

Tuesday, January 20, 2015

असरि

हमर जाति?
निरर्थक प्रश्न!

पुछबाक अछि
तँ पूछू
हमर असरि..

से सुनू
बड्ड असरदार छी हम
एतेक जे
जँ छू ली हम
हुनक छोड़लाहो
तँ भ' जाइत छनि
हुनक ऐंठार
किछु आओर ऐंठ!

हावड़ा-सिकंदराबाद फलकनुमा एक्सप्रेस
२०/०१/२०१५

कविता

भावुक मोन
कने डोलल
आखर झहरल

आखर-आखर
बीछि बीछि
किछु शब्द बनल

शब्दक मोती
गांथि-गांथि
किछु पाँति सजल

पाँति-पाँति
सुचि-स्नान करा
निर्मल अउँटल

अउँटल पाँति
ह्रदय बाटे
गढ़गर टघरल

गढ़गर भावक
रस बरसल
कविता जनमल

कोलकाता
२०/०१/२०१५

Monday, January 19, 2015

सांत्वना


किए कनैछी किए खीजैछी
अहिना होइछै

सानि नोर की थाल गीजैछी
अहिना होइछै

नीप लिय' चिनवार
जल घोंकल छै तैं की
चढ़ा दियौ परसाद
फल चूसल छै तैं की

फोड़ि माथ की सींथ भरैछी
अहिना होइछै

रक्त सँ की देबाल रंगइ छी
अहिना होइछै

छोड़ू न्याय विचार
क्यो लटकै छै तैं की
बंद करू केबाड़
क्यो भटकै छै तैं की

बेमतलब चूड़ी फूटैछै
अहिना होइछै

ठट्ठा मे टिकुली उजड़ै छै
अहिना होइछै..

कोलकाता
१९/०१/२०१५

अधोवास

किए करू
नरक निवारण लेल
उपास, आ की
कल जोड़ि
माथ निहुरा
प्रभु सँ
याचना / कामना
नरकवास सँ रक्षा हेतु..

कृपा तँ छन्हिए हुनकर
जे अही लोक मे
जिबिते मे
भेट गेल अछि पुष्ट सँ
तेहन ने अनुभूति
जे आब
केहनो नरकक
डर कहाँ?
संदेह कथीक?

कोलकाता
१९/०१/२०१५

रंगमञ्च


कलियुगी भगवानक
जिनका पर पड़ल
नेहक दृष्टि
से सब
भगत जन
खूब खाउ
करू रसपान

सोहि सोहि
चूसि चूसि
स्वादि स्वादि
कुतरि कुतरि

आ बाकी मनुक्ख सन जीव
जिनकर निर्माण भेल
कलियुगी भगवानक
विनोद लेल
आमोद लेल
टाइमपास
प्रमोद लेल
से सब
धैर्य धरू
शांत रहू
नयन जुड़ा
बाट जोहू

तड़पि तड़पि
सुबकि सुबकि
कुहरि कुहरि
बिलखि बिलखि

नञि बुझलियै?
आसक खुट्टा धेने रही
संभव छैक
कलियुगी भगवानक
आँखि होनि
कान होनि
ह्रदय होनि
अपन रंगमञ्चक
कलाकार सबहक लेल सेहो
धुक धुक करैत

संभव छैक..
छैक किने?

कोलकाता
१९/०१/२०१५

Sunday, January 18, 2015

मधुबन


कतेको नोर मुस्कायल
कतेको चोट बिहुँसैए
अहाँ के ठोर पर बैसल
कतेको दर्द चिहुँकैए..

बिलायल आँखि सँ सपना
ने बाजय हाथ मे कंगना
सुखायल गाल के सगरो
नहरि आँखिक भिजाबैए..

पियासल प्राण औनायल
ह्रदय केर स्पन्द अगुतायल
करेजक आगि देखू ने
हमर दुनिया जराबैए..

कोना चिनगी बनल धधरा
कोना प्रेमक बहल मदिरा
अहाँ के आँखि भीजैए
हमर जिनगी भसाबैए..

चलू ने लाँघि ई सीमा
चली ओइ पार मधुबन मे
जतय सँ गीत कोइली के
अहाँ के सोर पारैए..

कतेको नोर मुस्कायल
कतेको चोट बिहुँसैए
अहाँ के ठोर पर बैसल
कतेको दर्द चिहुँकैए...

कोलकाता
१८/०१/२०१५

Saturday, January 17, 2015

माँ मैथिली


हमर मायक
कोटि कोटि संतति
सभतरि
छीटल छिड़िआयल
जतय ततय
हमर मायक
कोटि कोटि संतति..

हमर माय
एक विशाल वृक्ष
संतति सब लुधकल
क्यो जड़ि धेने
क्यो डाड़ि पर बैसल
क्यो लटकल
क्यो गाछ सँ दूर
पड़ेबाक ब्योंत करैत
आ मारिते रास धी-पूत
पड़ा गेल पहिनहिं
दूर, बहुत दूर
कतहु सुखाइत टटाइत
कतहु कुटाइत पिसाइत..

क्यो गाछहिं पर बैसल
चैन सँ
चूसि रहल ओकर प्राण
क्यो लाज त्यागि
बेचि रहल गाछक
फल-फूल
डाड़ि-पात
क्यो सोहि रहल छाल
क्यो अ'ढ़ मे
बना रहल
गाछहिं केँ
अपन अस्तित्वक ढाल..

क्यो मतान्ध भेल
चढ़ि रहल
फुनगी दीसि
गछहिं पर रहि
यथासंभव
जड़ि सँ
दूर रहबाक नेयार
क्यो भीड़ लगा
बैसल फुनगी पर
कहुना पोन रोपि
यैह खसल
वैह खसल..

धरि ध्यान नहि
जखन खसत
फुनगी पर सँ
आ की, कतहु सँ
तँ बजरत भूमि पर
जड़िये लग
चेत बा अचेत
अंतिम आश्रय
अहि गाछक
हमर माय मैथिलीक
वैह छाँह
वैह जड़ि...

कोलकाता
१७/०१/२०१५

विरह


काल्हि राति, आ
आइ भोरक मध्य
यात्रा छल बड्ड दीर्घ
बड्ड असाध्य..

चलैत रहलहुँ
बताह भेल
गर्म बसात मे
तपल सड़क पर
भरि राति
बड़ी काल धरि..

बढ़ैत गेल डेग
आगिक धधरा पर
आ होइत रहल
अनंत उल्का-वृष्टि
अंग-प्रत्यंग पर
सगरि राति
कतेको काल तक..

देखू ने
फोंका पड़ल अछि
दुनू पएर मे
भरि देह मे
जहाँ तहाँ..

जहन गेबे केलहुँ
तँ अबैत छी किएक
अनेरे
विकल राति के
निठुर स्वप्न मे..

बूझैत नञि छियैक
विछोहक असरि
होइत छैक
सुनगैत कोइला सन
तप्पत
बड्ड तप्पत
जकर तापमान
बढ़ि जाइत छैक
एसगरुआ रातिक
बड़कैत निन्न मे...

कोलकाता
१६/०१/२०१५

Wednesday, January 14, 2015

इतिहास

।। डारि ।।

पुरना आवास
अतीतक आभास
मृदु-कोमल सीत
ह्रदय केँ छूबैत
कवि नज़रूलक गीत..

भरि घर
चौपेति क' राखल
स्मृत-विस्मृत
कतेको इतिहास
कतेको हर्ष
कतेको विषाद
कतेको गंध
कतेको स्वाद..

खिड़कीक बाहर
नीमक गाछ
गाछ पर सँ
कोइलीक वैह
चिर-परिचित गीत
पुछैत अछि भरिसक
कोना छह?
कतय छलह?
एतय सँ
किए गेलह मीत?

बौआइत चिड़ै
नोरायल आँखि
समटि क' पाँखि
फेर आबि बैसल अछि
किछु क्षणक लेल
अतीतक संग
हृदयालाप करैत
ओही गाछ पर
ओही डारि पर...

कोलकाता
१४/०१/२०१५

Tuesday, January 13, 2015

आंदोलन


पहिले..
जय मिथिला!
जय मैथिली!
जय मैथिल!

लगले..
जयकार भेल
हुँकार भेल
फुफकार भेल

आगाँ..
पहिने हम
बड़का हम
उप्पर हम

फेर..
रारि भेल
गारि भेल
मारि भेल

तखन..
जयकार ठुस्स
हुँकार हुस्स
फुफकार फुस्स

तहन..
खूब भेल
भइये गेल
भेटिये गेल!

जय जय जय जय हे!!

हैदराबाद
१३/०१/२०१५

Monday, January 12, 2015

अग्निस्नान


बाजि रहल
ढोल-मृदंग
झालिक झंकार
साधल सुर-ताल
मधुमय गीत संग
सभतरि आनंद..

लोक हँसैत
गीत गबैत
हाथ मे हाथ ल'
लोक नचैत..

हमहूँ छलहुँ नचैत
गीत गबैत
हँसैत-बजैत
मुदा ओ आयल
करा देलक अम्लस्नान
सीसी सँ बहरायल
अग्निजल
भोंकि देलक पोर-पोर
भोंकैत रहल
भोंकिते रहल
आ, क्षण भरि मे
हम भ' गेलहुँ
क्यो आन..

निश्चिन्त रहै जाउ
जुनि घबराउ
जीब हम
लड़ब प्रारब्ध सँ
परास्त हएत दुर्भाग्य..

सब हएत
सब भ' जएत
धरि जे भ' जाय
ई कहू
झरकल अस्तित्वक
की कएल जाय?
भोंकायल विश्वासक
दर्द कोना जाय?

हैदराबाद
१२/०१/२०१५

Sunday, January 11, 2015

जन्मभूमि

माटि-पानिक
अनुपम सुगंध
आँगन-दलान
खेत-खरिहान
होइत
कइएक मील
बसातक संग
उड़ैत
पैसैत अछि
श्वासक संग
हमर नस-नस मे
मिज्झर होइत अछि
प्राण संग
आ, पुछैत अछि
बौआ कहिया अएबह
अप्पन ठाम
अप्पन गाम?

पुबरिया ओसाराक
पुरबा बसात
पछबरिया ओसाराक
ढेकी आ जाँत
बाड़ीक केरा-लताम
कलमक सिनुरिया आम
धर्मराजक चिनबार
भनसाघरक सीक पर
कुच्चा आचार
बाबीक सब सरंजाम
एक-एक टा
खुट्टा आ खाम्ह
पठबैए संदेस
बौआ कहिया अएबह
अप्पन ठाम
अप्पन देस?

आँखि दुनू
सजल
कंठ कने
अवरुद्ध
सबटा खेल पेटक
मुदा आइ भूख
पेट सँ नहि
फाटइत करेज सँ
रहि-रहि उठइए
ह्रदय मे कतहु किछु
सुगबुग करइए..

हैदराबाद
११/०१/२०१५

Saturday, January 10, 2015

परिपाटी

।। परिपाटी ।।

हम बढ़लहुँ
एक डेग आगाँ
ओ खिचलनि
दू डेग पाछाँ..

लिय'
पहुँचि गेलहुँ
अनायास
एकहि डेग मे
आगामी काल्हि सँ
बीतल काल्हि मे
हुनकहि लग
हुनकहि संग
भेंट भेल
फेर एक बेर
उसनल राग
खोखड़ल रंग..

आब लेढ़ाइत रहब
उड़बैत रहब गर्दा
अतीत मे सन्हिआयल
घिघियाइत रहब
सुअदगर व्यथाक
चहटगर धांगल कथा
गढ़ैत रहब
आ लिखैत रहब
पीटल पिचायल कविता
भविष्यक अन्धकार पर..

हे!
करैत छैथ
बड्ड मेहनति
मोन-प्राण सँ
सशक्त करैत
बचओने छथि पंथ
रूढ़िक महंथ..

चलैत रहय ई
मुहिम अविराम
कर्क मानसिकता केँ
दंडवत प्रणाम!

हैदराबाद
१०/०१/२०१५

Friday, January 9, 2015

कर्मयोग


श्यामवर्ण
सुन्दर सुगठित देह
मुहेँठ पर अलौकिक आनंद
ओजमय श्रमिक
तेजमय देवपुत्र

बेहिसाब बोझ सँ
लदल ठेला
खींचि रहल केहन संकल्प सँ
ई श्रमिक देवपुत्र!
जेना विजयी भ' रहल हो
कुरुक्षेत्रक रणभूमि मे
जेना श्रवण कय घोंटि गेल हो
कर्मयोगक सम्पूर्ण अध्याय

ई विजयोत्सव होइत छैक
प्रतिदिन / प्रतिक्षण
भोर-साँझ / दिन-राति
उत्सव मे नचैत
समस्त संसार
लादैत बोझ लगातार

झहरैत घाम
चमका रहल छैक देह
ओहिना जेना
घृत-स्नान कय
चमचमाइत छथि
घसाइत/रागड़ाइत
बाबा बैद्यनाथ

नहि नहि!
कोनो अभियोग नहि
कहाँ कोनो रोष
कहाँ ककरो दोष
किए अनसोहांत
केहन बोझ
कहाँ कोनो भार
उघैत अछि बिहुँसैत
तपस्या मे भीजैत
युध्द मे जितैत
कर्मयोगक उद्धारक!

कोना बुझेतै भारी
केहनो बोझ ओकरा
जे उघि रहल हो सतत
निरंतर / सपरिवार
जीबैत रहबाक भार
खेपैत रहबाक बोझ

चलैत रहतैक योगीक
चिर समाधिक खोज..

हैदराबाद
०९/०१/२०१५

Thursday, January 8, 2015

बिरड़ो

फेर
कलम पर चलल गोली
खसल बारूद
नील-कारी सियाही संग
मिज्झर भेल
गाढ़ सिनुरिया रंग
आ लेपा गेल भीत पर
चारू कात..

औनायल विश्व भेल
कने आर रक्तवर्ण..

नील अकास
नुका रहल अविराम
द्रुत बेग सँ
झाँपि रहल छैक सगरे
बिकट कारी मेघ
नीलाम्बर असहाय!
आदंकक आक्रमण सँ
थरथराइत..

गरजैत स्याह मेघ
जनि रहल अछि निर्बाध
मूसलधार सोनितक वृष्टि
माटि भ' रहल लाल
आँखि भ' रहल लाल...

चहुँदिस गाढ़ अन्हार
अन्हरायल बौक मनुख
आ, एहि भयावह अन्हार मे
कारी चश्मा पहिरने
मुकुटधारीक हेंज
करबद्ध हकमैत
थर-थर करैत
फुसफुसाइत
निष्ठाहीन खंडनक
अस्फुट निरर्थक शब्द...

सुनने छी मुदा
जखन खसैत छैक
कलम पर बारूद
तँ कलमो बनैत छैक अग्नेयास्त्र
फेकैत छैक आगि
उठबैत छैक बिरड़ो
उधियाइत छैक कारी मेघ
परिष्कृत होइछ अकास
पुनि होइछ इजोत..

फेर कलम पर
खसलैए बारूद
हउए देखियौ -
प्रत्याघात!
उठलइ झंझावात!!

हैदराबाद
०८/०१/२०१५

Wednesday, January 7, 2015

विश्वासघात

विश्वासक घेंट पर सँ
ई कुरहरि
हटा लिय'
मुइत विश्वास तँ
मरब हमहूँ, अहूँ
मरत समस्त विश्व
सकल संसार..

माटि बीज संग
जड़ि पात संग
सुरुज भोर संग
गंध फूल संग
ज्ञान सत्य संग
जँ करय विश्वासघात
तँ करू कल्पना
केहन जंत्रणा
कतय संभावना
ब्रह्मंडक अस्तित्वक?

विश्वासक घेंट पर सँ
ई कुरहरि
हटा लिय'
नहि तँ
कुहरि-कुहरि मुइल
जगतक चिता केँ
के देत आगि?
के करत श्राद्ध?

हैदराबाद
०७/०१/२०१५

Tuesday, January 6, 2015

गाछ


एंह!
कहैत छी फुसिये
जे नहि छैक गाछ
शहर मे
पर्यावरण पर संकट..
प्राकृतिक विपदाक सूचक..
सबटा फुसिये!
हइए सुनू..

हमर भीजल मोन मे
एकटा विशाल गाछ
झमरल डाड़ि-पात
फल-फूल सँ छाड़ल
हमर मोनक गाछ

अही गाछ सँ भेटैत छैक
हमर मोन के
ऑक्सीजन
तँय लैत अछि श्वास
हमर मोन
शुद्ध बसात मे
आ जीबैत रहैत अछि
प्रति क्षण

मोनक गाछ पर
असंख्य चिड़ै-चुनमुन
अपन-अपन खोंता मे
गीत गबैत
आ, ओकर सबहक संग
सुर लगबैत अछि हमर मोन
झूमैत आनंद मे
फेर उड़ितो अछि स्वछन्द
ओकरे सबहक संग
चंचल घुम्मकड़ मोन

उड़ैत उड़ैत
गाछ सँ दूर
प्रदूषित होइत अछि
आक्रान्त/विभ्रांत
बेदम होइत अछि
आ थाकल ठेहीआयल
घूरि अबैत अछि
बैसि जाइत अछि
अपनहिं गाछक तर
शीतल छाहरि मे
सुस्ताइत अछि
फेर होइत अछि सुभ्यस्त
फेर ऑक्सीजन
शुद्ध बसात
चिड़ै-चुनमुन
फेर गीत-संगीत
फेर उन्मुक्त उड़ान

शहर मे
हम छी
हमरे मे हमर मोन
मोन मे गाछ
गाछक संसार
हे लिय'
भ' गेल ने
शहर मे गाछ!
कतेक हरियर गाछ..
कतेक हरियर शहर..
बाह रे बाह!!

हैदराबाद
०६/०१/२०१५