Wednesday, December 31, 2014

रंग-बिरंग

रंगभूमि
बंगभूमि..

कौखन हरियर
कौखन लाल
कतहु हरियर
कतहु लाल
कहियो हरियर
कहियो लाल

एमहर हरियर
ओमहर लाल
एकर हरियर
ओकर लाल
तप्पत हरियर
दहकल लाल

सुग्गा हरियर
लोलहिं लाल
हरियर नूआ
अलता लाल
हरियर टिकुली
चूड़ी लाल
हरियर कुर्ता
लाल रुमाल
हरियर चश्मा
औंठी लाल

हरियर पोथी
आखर लाल
हरियर खेत
पटायल लाल
हरियर देह
नहायल लाल
हरियर पान
चिबबिते लाल

हरियर-हरियर
लाले-लाल
रंगस्थली
पश्चिम बंगाल!

प्रजातंत्र

जनतंत्रक मुख्य अखाड़ा मे
अधिकार-शक्ति केर प्रांगण मे
आङ्गुर पर चेन्ह लगैत रहल
कयो धोआ गेला क्यो पोछा गेला

सभ बाट-घाट चौराहा पर
भीतर-बाहर घर आँगन मे
बुधियारिक ढेका फुजैत रहल
क्यो नुका गेला क्यो देखा गेला

जनाधिकार केर महाकुम्भ
नित लोहछल लोकक मेला मे
शोषण केर खुट्टा खसैत रहल
क्यो धरा गेला क्यो पड़ा गेला

निर्णय-स्थल जनमानस केर
पाखंडक डीह-घराड़ी मे
भोटरक बुलडोज़र चलैत रहल
कयो लेढ़ा गेला क्यो धंगा गेला

लगचियैल दुर्जन विनाश
चहुँदिस सब गाम-नगरिया मे
थेथरइ केर कोठा ढहैत रहल
क्यो नुका गेला क्यो बिला गेला

संविधान केर प्रबल तेज
धधकल-पजरल जनमानस मे
गणतंत्रक अन्हर बहैत रहल
कयो बहा गेला क्यो दहा गेला

कयो फेका गेला क्यो फेंटा गेला
क्यो सुखा गेला क्यो टटा गेला..

Sunday, December 28, 2014

रहय दियौ


सब आँखि-कान मूनल रहय
सब मनोभाव सूतल रहय
धारक प्रवाह केँ बहय दियौ
जे जहिना छइ से रहय दियौ

ओ मारि-काटि हुँकार भरय
ओ रक्त पीबि जयकार करय
सोनित केर धारा बहय दियौ
जे जहिना छइ से रहय दियौ

ओ धर्म बेचि अगराइत रहय
ओ चीर-हरण दिन-राति करय
दकचल सम्मान केँ जरय दियौ
जे जहिना छइ से रहय दियौ

ओ मान-प्राण झीकैत रहय
ओ लूटि-छीनि गीड़ैत रहय
मनुखक लहास तीड़य दियौ
जे जहिना छइ से रहय दियौ

ओ मूक, मौन धारण केने
मूड़ी घुमाय धनि-सन रहय
ए.के.सैंतालिस चलय दियौ
जे जहिना छइ से रहय दियौ

मानवता जर्जर ढहइत रहय
चंडालक संख्या बढ़इत रहय
टकसालक घंटा बजय दियौ
जे जहिना छइ से रहय दियौ

क्यो कतहु फेर अवतरित हुअय
पापक विनाश सुफलित करय
ताबत ई खेला चलय दियौ
जे जहिना छइ से रहय दियौ

धारक प्रवाह केँ बहय दियौ
जे जहिना छइ से रहय दियौ..

Saturday, December 27, 2014

सुगंध

।। सुगंध ।।

हमर किछु शब्द
ओझरायल अछि
वीभत्स / विकराल
मकड़ीक जाल मे
जे बुना रहल अछि
मस्तिष्क मे कतहु..

आ, हमर आलस्य
ऊर्जा दय रहल
जोलहा केँ -
द्रुत गति सँ
बुनि रहल अछि जाल
बढ़ि रहल आकार
असंख्य आखर/शब्द
उड़ि उड़ि क'
ओझराइत जा रहल
जाल मे
हाक्रोश करैत
भीजल आँखि सँ
तकैत हमरा दीसि
क'ल जोड़ने..

बन्हक बनल शब्द समूह
हमर छिड़ियायल/ओझरायल
मृतप्राय संतति
गंधहीन होइत शब्दपुष्प
हे दैब!
आलस्यक विध्वंश अनिवार्य
चैतन्यक अवलंब
नितांत आवश्यक
उठय पड़त
किछु करय पड़त..

पैसि क' मस्तिष्क मे
मकड़ी केँ परास्त कय
हटायब जाल
उद्धार कय शब्दगुच्छ केँ
गाँथब पुष्पमाल
आ, छींट देब सगरे
माटि-पानि पर
शब्दहारक अनुपम सुंगंध
मातृभाषाक अनुराग संग
पैसि जाय कदाचित्
श्वासक बाट होइत
हृदयक अंतर मे
कतहु / ककरो...

Sunday, December 7, 2014

इजोत


अनवर आई बड्ड थाकि  गेल रहय।

तीन दिन सँ प्रोजेक्टक रिपोर्ट बनबय मे लागल छल, से आई जा कऽ समाप्त भेलइ। महत्वपूर्ण कार्यक सम्पादन सँ मोन हल्लुक तँ भेलइ, मुदा तीन दिन आ तीन रातुक मस्तिष्क-मंथन सँ मोन उजगुजा सेहो गेल छलैक। शारीरिक श्रम तँ  तेहन किछु नहिं भेल रहैक, मुदा देह सेहो टूटैत सन बुझाइत रहैक।

इच्छा भेलैक एक कप चाह पीबाक।  मुदा चाह ऑफिस कॅन्टीनक नहिं। बेकार चाह बनबइ जाइत छैक कॅन्टीन मे, एकदम पनिसोह! एखन मोन होइत रहैक भोला ठाकुरक होटल बला चाह पीबाक। भोला ठाकुर भले कतबो बदमास हुअय, ओकर होटलक चाह धरि अपूर्व होईत छैक।

अनवर केँ क्यो कहने रहैक जे ८ बर्ख पहिने सीतामढ़ी सँ भोलबा अइ शहर मे आयल रहय। पढ़ल लिखल किछु खास नहिं रहय मुदा अफसरीक छगुन्ता लागल रहैक। तेहन नोकरी कतहु नहिं भेटलइ तँ छोट-मोट नेतागिरी करय लागल। विधायकी चुनाव मे निर्दलीय उम्मीदबार भऽ लड़बो कयलक, मुदा जमानतो जब्त भऽ गेलइ। तहिया सँ लीडरी तँ बंद भऽ गेलइ मुदा गुण्डइ चलिते रहलइ।

आ से जखन वृन्दावन होटलक मालिक रामजीवन साहुक देहावसान भेलइ तँ भोला ठाकुर ओकर होटल पर कब्जा कऽ लेलक। रामजीवनक संतति अधिकार लेबय एलई तँ मारि-पीटि कऽ बइला देलकइ। आमदनी नीक होमऽ लगलइ आ भोला ठाकुरक टनटना गेल।

शहरक मुख्य सड़कक अइ कात अनवरक ऑफिस आ ओइ कात वृन्दावन होटल। चाह-जलखइ करय अनवर ओतहि जाय। कहियो काल भोजनो ओतहि करय। होटलक कर्मचारी सब मैथिले। भोजन-भात, चाह-जलपान सब उत्कृष्ट। भीड़ सदैव लगले रहइक। मनेजरक टेबुल पर भोला ठाकुर चक्का बला कुरसी पर पान चिबबैत विराजमान रहैत छल।

भोला ठाकुर भले कतबहु अनवरक आँखि मे गड़इ, होटलक आन कर्मचारी सब मुदा ओकरा बड्ड नीक लगइ।  ताहि मे एकटा ११-१२ बर्खक छौंड़ा विशेष रूप सँ ओकर ध्यान के खीचि लइ। दुब्बार पातर। सुन्दर, श्यामवर्ण मुँहेँठ पर सदिखन भयक परत चढ़ल। आँखि पैघ मुदा शुष्क। मैल, फाटल टी-शर्ट आ डाँर सँ खसैत निक्कर। हाथ मे सदिखन एकटा प्लास्टिकक ट्रे मे टेबुल सब पर पानि छिंटबा लेल एकटा मग आ पोछबा लेल एकटा स्पोंजक टुकड़ा।   

एक दिन जलखइ करैत बजओने रहैक छौंड़ा केँ अनवर। छौंड़ा डरायले आयल रहैक आ ओकर टेबुल लग ठाढ़ भ गेल रहै। अनवर देखने रहै ओकर दूनू तरहत्थी पर ३-४ टा कऽ फोंका। बाँहि आ टाँग पर चोटक निसान।

"की नाम छउ बाउ?" अनवर पूछने रहइ

"सत्तन" पातर बाल-स्वर फूटल रहैक।

"एतय काज कियैक करइ छैं, स्कूल कियैक नहिं जाइत छैं?" अनवर दोसर प्रश्न केने रहै। 

छौंड़ा मौन रहलइ। 

"देह पर ई चोट कोना लगलौ?" फेर एकटा प्रश्न। 

छौंड़ा चुप्प रहलइ।

"क्यो मारलकउए?"

छौंड़ा बौक रहलइ। डरे देह थरथराय लगलइ।

 "माय -बाप कतय छऊ?"

"काज अइ, जाइ छी" कातर बाल -स्वर फूटल रहइ।

मारिते रास अनुत्तरित प्रश्न ल कऽ ओइ दिन वृन्दावन होटल सँ बिदा भेल छल अनवर। 

आरो कतेको रास प्रश्न सन्हिआय लागल रहैक मस्तिष्क मे। कोमल शैशव केँ अइ अवस्था मे ई गति! बालपनक एहन स्वरुप किएक? शिक्षाक संवैधानिक अधिकार की  केवल कागती औपचारिकता मात्र छैक? बाल-श्रम विरोधी कानून की खाली राष्ट्रीय टेलीविज़न समाचार चैनल सब पर दिन-राति परसल जाइत अनर्गल शास्त्रार्थक विषय-वस्तु होयबाक लेल बनाओल गेल छैक?

एहने आर कतेको प्रश्न उद्वेलित करैत रहलइ अनवर केँ ओइ दिन। ऑफिसक अन्य कर्मचारी सभ सँ पूछने रहय सत्तनक मादे।  एकटा पुरान सहकर्मी कहने रहै सभटा खिस्सा।  सत्तनक बाप बिरजुआ भोले ठाकुरक होटल मे भनसिया रहैक।  अथाह नीक लोक। भोजनो दीब बनबय। एक दिन भिनसरे मदर डेरीक बूथ सँ दूध लाबय लेल सड़क पार करैत रहय की कोनो मदमत्त ट्रक चालक ठोकर मारि कऽ भागि गेलइ। बिरजुआक ठामहिं प्राण छूटि गेलइ।

मास भरि पहिने सहरसा सँ १० बर्खक बेटा केँ लऽ कऽ घुरल रहय बिरजू। जाय सँ पहिने तीन हजार टाका पैंच लेने रहैक भोला ठाकुर सँ। कहने रहैक जे गाम जाइत छी तँ किछु जमीन बेचब। घुरिते पाई लौटा देब। मुदा ओकर घुरबाक किछुए दिन बाद ई दुर्घटना भऽ गेलइ। ठाकुर केँ अप्पन पाइ बुड़ैत बुझना पड़लै तऽ छौंड़ा केँ बँधुआ काज पर लगा लेलक।

किछु मासक बाद सत्तनक माय आयलो रहैक बेटा केँ लऽ जाय लेल।  मुदा भोलबा कहलकइ जे तीन हजार टाका मूल आ दस टके सैंकड़ाक दर सँ सात मासक सूदि एक्कइस सय टाका जोड़ी कऽ कुल एक्कावन सय टाका ओकर हाथ पर धऽ दइ आ बेटा के लऽ जाय। सत्तनक मायक लेल ई असंभव रहैक। कतबो कनलै-खिजलै, कतबो मिनती-नेहोरा केलकइ, भोला ठाकुर लेल धनि सन। धकिया कऽ भगा देलकइ। कहाँदन मौगी बताहि भऽ गेलइ।  रेलगाड़ीक आगाँ छरपि कऽ कटि गेलइ।

तँ से तखिने सँ सत्तन बेगारी खटि रहल छल भोला ठाकुरक होटल मे। बात-बात पर ठाकुर छौंड़ा केँ मारइ-पीटइ, बड्ड दुर्दसा करइ। दरमाहा देबाक तँ बाते कोन !

सब खिस्सा सूनि अनवरक मोन आर तीत भऽ गेल रहइ। ने भरि दिन ऑफिस मे काज करय मे मोन लगलइ, ने राइत भरि निन्न भेल रहैक।  ओछाओन पर कछमछाइत रहि गेल रहय। मोनक शांतिक लेल फादर एडवर्ड केँ स्मरण कयने रहय।

फादर एडवर्ड एक्का। शहर मे प्रवेश करबा सँ किछुए पहिने सड़कक दछिनबारी कात जे बड़का गिरजाघर छैक, तकरे मुख्य पादरी छलाह फादर एडवर्ड। मध्यम कद-काठी, श्यामवर्ण रूप, ठोर पर सदति निश्छल मुस्कान आ आँखि सँ निरंतर बहराइत स्नेह-किरण। दुइएटा काज मात्र - ईश्वरक आराधना आ समाजक निष्काम सेवा।

गिरजाघरक कंपाउंड मे आर दू टा मकान।  एकटा मे मातृ-पितृ विहीन धिया-पुता सभक लेल पाठशाला आ दोसर मकान मे छात्रावास। एहि सब सरंजामक व्यक्तिगत रूप सँ ध्यान राखथि फादर एडवर्ड। कोनो धिया-पुता केँ कनिको कष्ट होइ तऽ करेज फाटऽ लगइन फादर एडवर्डक।

सैह फादर एडवर्ड एक दिन एकटा ३ बर्खक कनैत नेना केँ लऽ कऽ गिरजाघर आयल रहैथ। शहर गेल रहैथ कोनो  काज सँ। घुरैत काल सड़कक कात मे एहि नेना केँ कनैत देखलखिन। गाड़ी थम्हौलनि। नेना केँ कोरा मे उठा कऽ बड़ी काल धरि ओकर माय-बापक प्रतीक्षा कयलनि। अंततः थाना मे सूचना दय नेना केँ गिरजाघर लेने गेलखिन। नाम पुछलखिन तँ कहलकनि "बेटू"। माय-बापक मादे पुछलखिन तँ नेना कनिते बाजल छल "अम्मी, अब्बू !"

क्यो नहीं एलहि ओहि नेना के लेबय लेल।  गिरजेघर मे पालन पोषण भेलइ। ओत्तहि आरंभिक शिक्षा-दीक्षा। जुम्मा मस्जिदक मौलवी साहेब कुरान-शरीफक ज्ञान-वर्षा केलखिन। आगाँ कॉलेज गेल। एम. बी. ए. कएलक। पढ़ितो रहल आ गिरजाघरक पाठशाला मे पढेबो कएलक। बड्ड स्नेह सँ फादर एडवर्ड ओकर नाम रखने रहथिन - मोहम्मद अनवर। अनवर - माने इजोत। "छौंड़ा खूब काज करत, अन्हार मे इजोत करत".…

मुदा कहाँ कतहु इजोत केने रहय ओ? अनवरक ह्रदय कलपि उठलइ। जहिना सब पढ़ैए तहिना पढ़ैत रहल। जहिना सब जीबैए तहिना जीबैत रहल। बहुराष्ट्रीय कम्पनी मे नोकरी भेलइ। पाइ अबैत रहलै, पाइ जाइत रहलै। खेलक, पीलक, पचओलक। जहिना सब करैए तहिना करैत रहल। नदीक धार संग बहैत रहल। छी छी छी! की करैत रहल? की करैत रहल!… 

हठात भक्क टुटलई। अतीतक अकास मे बौआइत-ढहनाइत अंततः वर्तमानक भूमि पर खसल अनवर।

पिउन आयल रहैक चाह-बिस्कुट लऽ कऽ। 

खिन्न मोने बाजल अनवर " लऽ जो। ई नञि पील हएत। "

पिउन बड्ड मानइ ओकरा। स्नेह सँ कहलकइ "पी लियऽ ने, जखन सँ एलहुँ, पानियों नञि पीने छी।" 

अनवर कुरसी सँ उठैत बाजल "जाइ छी ठाकुरक होटल। ओत्तहि चाह-जलपान कऽ लेब।"

नहुँए-नहुँए  डेग धरइत होटलक दीसि बिदा भेल अनवर। देह बड्ड भारी बुझाइत रहैक। जेना माथ पर एक ढाकी पजेबा लादल होइ। 

होटल मे बैसि कऽ दू टा समोसा आ एक कप चाहक आर्डर देलकइ अनवर। बैरा समोसा आ चाह आनि कऽ दऽ  गेलइ।

सबसँ आगा बला टेबुल पोछि  रहल छल सत्तन। ओही टेबुल पर एकटा जोड़ा अपन ५-६ बर्खक बच्चा केँ  लऽ कऽ बैसि गेल। बच्चा हाथ मे एकटा गेन लेने खेलय मे  मग्न छल।  सत्तन टेबुल पोछि क आगू बढ़ल। खेलाइत-खेलाइत बच्चाक हाथ सँ गेन छुटि गेलइ आ सत्तन दीसि गुड़ैक गेलइ। बच्चा गेन लेबऽ दौगलइ आ सोझे सत्तन सँ टकरा गेलइ। सत्तन असंतुलित भऽ गेल आ ट्रे मे राखल मगक सबटा जल सामने सूट-बूट पहिरने एकटा ग्राहक पर जा पड़लइ। ग्राहक चिचियाइत ठाढ़ भऽ गेल।

सत्तन डरे काँपय लागल। मुँहेँठ आरो सुखा गेलई। मनेजरक टेबुल पर सँ उठि क भोला ठाकुर दौगल आयल आ छौंड़ा के गारि पढ़ैत लतियाबय लागल। सत्तन डिरियाइत रहल, आ कुटाइत रहल।

तामसे लाल भऽ गेल अनवर।  ठाकुर केँ ठेल कऽ छौंड़ा केँ छोड़ौलक आ ओकर गट्टा पकड़ि आगा बढ़ल।


ठाकुर सम्हरल आ अनवरक आगू आबि ठाड़ भऽ चिकरल "बच्चा के छोड़ि दियउ अनवर मियाँ, नहिं तऽ अनर्थ भऽ जायत!"

होटलक मेन गेट पर सँ गोरखा दरबान दौगल एलै आ अनवरक हाथ मे अप्पन खुकरी थमा देलकइ। अनवरक आँखि सँ धधरा उठैत रहइ। ठाकुर केँ खुकरी देखबैत गरजल "ठामहिं रुकि जो ठाकुर नहिं तऽ चीरि कऽ राखी देबउ !"

भोला ठाकुरक शरीर मे जेना सोनित बहब बन्न भऽ गेलई। खुकरी तक ओकर नजरियो नहिं गेलइ। अनवरक आँखिए देखि कऽ देह सुन्न भ गेलइ। कहुना दू डेग पाछू भेल। आर जे लोक सब तमासा देखइत रहय, सेहो सब कात धेलक।

सत्तनक हाथ धेने अनवर गोरखाक हाथ मे खुकरी धरइत होटल सँ बहरायल।  सड़क पर आबि एकटा रिक्शा कयलक आ गिरजाघर दीसि बिदा भेल। सत्तन भरि पाँज कऽ पँजियोने रहइ ओकरा। ओ नेनाक केस मे हाथ फेरैत रहल।

ओकरा भेलइ जेना माथ पर सँ पजेबाक ढाकी उतरि गेल होइक। आ, सत्तन केँ देखि कऽ बुझेलइ जे ओकरा लेल वृन्दावन होटलक महाकाय अन्हारक अंत भऽ गेल छलैक।

आगाँ मात्र इजोतक महासमुद्र रहैक। इजोते-इजोत…


Monday, December 1, 2014

बिहाड़ि

अनामिका भरि राति करौट फेरइत रहलि। ओछाओन पर कछमछ करैत रहलि। निन्न नहिंए भेलहि ओकरा।

कल्हुका बिहाड़ि एखन धरि थम्हल नहिं रहइक। साँय-साँय बसात बहैत रहइक मोन मे। किछु अनर्गल होयबाक संभावना भयाक्रांत केने रहैक।  बुझाइत रहइक जेना सब किछु समाप्त होबय बाला होइक।  सब किछु....

कहुना  भोर भेलैक। आन दिन सँ पहिनहिं ओछाओन छोड़ि देलक अनामिका।  उठितहि नहा-सुना कऽ भनसा घर में पईसल आ जलखई-टिफिनक ओरिआओन मे लागि गेलि। पहिने ७ बजे मुन्नूक स्कूल बस औतहि। तकर बाद ९ बजे प्रकाशक कार्यालय जेबाक बेर होयतहि। एखन समय छैक, मुदा स्वयं के कोनो काज मे ओझरा कऽ राखऽ चाहैत रहय ओ। प्रकाशक ध्यान अबितहिं मोनक बिहाड़ि आओर द्रुत गति धऽ लेलकहि।

आई चाहो नहिं पीने छलि एखन धरि। आन दिन भिनसरे उठिते सब सँ पहिने चाहे पीबैत छल ओ, तकर बादे आन कोनो चर्जा। मुदा आई सेहो बिसरा गेल रहैक। भेलहि जे चाह पीत तऽ संभवतः मोन कने शांत हेतहि। चाह बनओलक, पीबो कयलक। मुदा कोनो असर नहिं। पश्चाताप आ भय सँ मिज्झर भेल मनःस्थिति यातना दैते रहलहि।

मुन्नू केँ उठौलक आ स्नान करा कऽ स्कूल जयबा लेल तैयार करओलक। जलखै करा कऽ ओकरा बस मे बाईसा कऽ घर आपिस आयलि तँ देखलक जे प्रकाश दाँत माँजि रहल छल। प्रकाश कें चाह बना कऽ देलकहि आ चुप्पे चाप ओकरा लग बैसि गेलि। आँखि मिलेबाक साहस नहिं होइत रहैक।

प्रकाश पुछबो केलकहि "राति मे निन्न नहिं भेल की? आँखि दूनू लाल भेल अछि। "

आँखि निहुँरौनहिं अनामिका उतारा देलकहि "हॅं, ठीक सँ सूति नहिं सकलहुं"।

"कियैक, की भेल से? मोन ठीक अछि?" चाहक चुस्की लैत पुछलकहि प्रकाश।

"मोने कने भरियायल बुझाइत अछि।  मुदा अहाँ फिकिर जुनि करू।  हरारति सँ भऽ गेल हएत, ठीक भऽ जायत।"

चाहक कप टेबुल पर राखि बिहुँसैत बाजल प्रकाश "से एहन की केने रही जे हरारति भऽ गेल?"

अइ बेर कोनो उतारा नहिं देलकहि अनामिका।  खाली कप उठा कऽ भनसा घर दीसि चलि गेलि।

प्रकाश कोनो विशेष ध्यान नहिं देलक। भेलै जे निन्न नहिं भेल छैक ठीक सँ तएँ मने मोन खिजायल छैक, एखन आर चौल करब ठीक नहिं। ओ अखबार पढ़ऽ लागल।

ऑफिसक लेल तैयार भऽ कऽ प्रकाश जलपान कयलक। डाइनिंग टेबुलक दोसर कुर्सी पर अनामिका ओहिना माथ निहुँरौने बैसलि छलि।  प्रकाश केँ किछु अनसोहाँत लगलहि ।  निन्न नहिं भेलैक तऽ मोन भरियायल छैक, से तँ ठीक।  मुदा एक्के बेर ऐना गुमसुम किएक अछि अनामिका? ऐना तँ पहिने कहियो नहिं भेल रहय।  जहिया अस्पताल मे भर्ती छलि तहियो बिहुँसैत रहैत छलि, ठट्ठा करैत छलि।  एना गुमसुम रहब तँ एकदम ओकर स्वभावक विपरीत छैक। अंदेसा होमऽ लगलैक प्रकाश केँ।

पुनः जिज्ञासा केलकहि प्रकाश "बाजू ने की बात अछि? हमरा सँ कोनो अपराध भेल अछि की?"

हृदय कलपि उठलहि अनामिका केँ। अपराध बोध सँ तऽ ओ स्वयं ग्रसित छलि।  बाजलि "ई की कहइत छी अहाँ? अहाँ सँ कोनो अपराध भैये नहिं सकैत अछि। कियेक फिरिसान होइत छी एना? कहलहुँ ने, मोन कनी भरियायल अछि। कने काल सूति रहब तँ ठीक भऽ जायत। "

किछु गंभीर भऽ कऽ बाजल प्रकाश " फिरिसान नहिं , मुदा हँ! किछु चिंतित अवश्य छी।  अहाँ के एना देखबाक आदति नहिं अछि हमरा। आ चिंता हमरा नहिं हएत तऽ ककरा हेतइ ? हमरा एखनहुँ लागि रहल अछि जे अहाँ हमरा सँ  कोनो बात नुका रहल छी। जे किछु बात छैक से कहि दियऽ। मोन हल्लुक भऽ जायत।  हमरा नहिं कहब तऽ ककरा कहबहि? जीवन-संगी छी हम अहाँक, जीवन पर्यन्तक संगिनी छी अहाँ हमर। "

स्वयं के सम्हारब असाध्य भऽ रहल छलैक अनामिका केँ। प्रकाशक गप्प सूनि कऽ बुझेलहि जेना कना जेतहि। परिस्थिति केँ सम्हारबाक प्रयास करइत  बाजलि "चिंता जुनि करू। किछु नहिं भेलए हमरा। कोनो बात नहिं अछि। जे किछु कने-मने मोन भारी अछि से लगले ठीक भऽ जाएत। अहाँ निश्चिन्त भऽ कऽ ऑफिस जाऊ, अबेर भऽ रहल अछि।"

किछु आश्वस्त होइत प्रकाश बैग के कन्हा पर लटकओलक आ ऑफिसक लेल बिदा भेल। ठीके अबेर होइत रहैक।

प्रकाश केँ मुख्य दुआरि तक अरियाति कऽ अनामिका आबि कऽ सोफा पर बैसि रहलि। भेलई जे एहि मानसिक बिहाड़ि मे ओकर मस्तिष्क फाटि जेतैक। कहुना एहि बिहाड़ि के थम्हेनाइ आवश्यक बुझाय पड़लहि ओकरा।  एहि मादे पहिने टी.वी. चालू कएलक आ कईएकटा चैनल बदलि-बदलि कऽ देखलक। मुदा किछु नीक नहिं लगलैक। आन दीन प्रकाशक ऑफिस जयबाक बाद घंटो घंटा धारावाहिक सबहक एपिसोड देखैत छलि। बड्ड नीक लगैत छलैक ओकरा ई सभ धारावाहिक। प्रकाश खौंझाइतो छलैक मुदा अनमिकाक लेल धनि सन। मुदा आई ओकरा सब अनसोहाँत लागि रहल छलैक। टी.वी. बन्न कऽ देलक अनामिका।

उठि कऽ बरण्डा दीसि गेलि। घरक छहरदेवारीक बाहर पूब दीस सँ एकटा विशालकाय पीपरक गाछ रहैक। गाछ पर मारिते रास चिड़ै सभ खोंता बनओने  रहैक।  ओहि  चिड़ै-चुनमुनिक चिहुँकब सूनि कऽ बड्ड आनन्द भेटईक अनामिका केँ। पीपर गाछक विशालता ओकरा जीवन-दर्शनक बोध करओबही। मुदा आई से नहिं  भेलैक।  ने चिड़ै-चुनमुनिक मधुर स्वर ओकर मोन केँ  शांत कऽ सकलहि आ ने पीपरक जीवन-दर्शन। ओकरा बुझएलै जेना पीपरक पातक झुरमुठ मे ओकर मोन आर ओझरा रहल छैक।

ओ अपन कमरा मे आबि कऽ पड़ि रहलि। मोनक अशांति केर नहिं जानि केहन अस्त्र होइत छैक जे उदराग्नि के पूर्णतः नष्ट कऽ दैत छैक। आ सैह भेल रहइक अनामिकाक संग। आइ जलखइयो नहिं कयल भेलैक।  निन्न एखनहुँ नहिं भऽ रहल छलैकए। कतबहुँ प्रयास कयलक मुदा भितरका चक्रवात निद्रा के ओकर आँखि मे नहियें पैसऽ देलकहि।

स्मृति घीचि कऽ लऽ गेलहि परसू रतुका ओहि फोन कॉल दीसि। अमरेंद्र भाई फोन केने रहथिन प्रकश केँ। अमरेंद्र माने प्रकाशक पितियौत, जे ओही शहर के एकटा दोसर मोहल्ला मे रहैत छलाह अपन माय आ अनुजक संग।  पत्नीक स्वर्गवास भऽ गेल रहन्हि आ छोटका भाय हुनके संग रहि कऽ कम्पटीशनक तैयारी क रहल छलैन्ह। माय के मोन खराब छलैन्ह किछु दिन सँ। हुनके समाद देबय लेल फोन केने रहथिन अमरेंद्र भाई। अनामिका केँ बड्ड मानथिन हुनक माय।  समाद देने रहथिन जे पुतहु सँ भेंट करबाक बड्ड इच्छा भऽ रहल छैन्ह, से किछुओ काल लेल अबस्से चलि आबथि अनामिका जते शीघ्र संभव भऽ सकनि।

प्रकाश समाद प्रेषित केने रहैक पत्नी केँ। अनामिका तुरन्त मानि गेल रहय। सासु मायक सन स्नेह करैत छलखिन्हए ओकरा। ओकरो किछु दिन सँ इच्छा भऽ रहल छलैकए बूढ़ी सँ भेंट करबाक। पति के कहलक "काल्हिये चलि जाइत छी काकी सँ भेंट करय लेल। बहुत दिन भऽ गेल हुनका देखना। भिनसर अहाँ के ऑफिस बिदा कयलाक बाद हम काकी ओतय चलि जायब आ दुपहरिया मे मुन्नू के लइत घुरि आयब। "

"निश्चिते जाऊ। अहाँ सँ भेंट करबा लेल मोन लागल छैन्ह काकी केँ" प्रकाश किछु गंभीर होइत बाजल।  "अस्वस्थ छैथ, किछु क्षण अहाँक संग भेटतैन्ह तऽ प्रसन्नता हेतैन्ह। मोन हल्लुक हेतैन्ह आ संभव अछि जे स्वास्थ्य मे किछु सुधारहुँ भऽ जानि। हमरा दीसि सँ क्षमा माँगि लेबन्हि आ कहबन्हि जे रबि दीन अबस्से हम जा कऽ भेंट करबन्हि। आवश्यक कॉन्फरेंस चलि रहल अछि ऑफिस मे एखन, सप्ताह भरि एकदम पलखति नहिं अछि। "

से काल्हि ओ गेल छलि काकी सँ भेंट करय लेल। आ ओतहि आयल रहइक ई भयंकर बिहाड़ि जे एखन धरि तहस-नहस मचौने रहैक ओकर अंतःकरण मे…

काकी सँ बहुत दिन पर भेंट भेल छलैक। देखिते काकी हुलसि कऽ पजिया लेने छलखिन्ह ओकरा। कतोक काल तक ओकर मुहेंठ हाथ मे थमने निहारइत रहलखिन्ह अनामिका केँ। छोरलकिन्ह, तहन जा कऽ अवसर भेटल रहइ ओकरा सासु के गोड़ लागय के। बड़ी काल तक दूनू सासु-पुतहु गप्प करैत रहलीह।  अमरेंद्र ऑफिस चलि गेल रहैथ आ राजेंद्र भाउज केँ गोड़ लागि क अपन कमरा मे चलि गेल छल पढ़य लेल।

काकी केँ कईएक बरख सँ मधुमेह छलैन्ह। उच्च रक्तचापक सेहो सिकाइत रहैत छलैन्ह। अइ किछु दिन सँ दूनू बढ़ल छलैन्ह। इलाज निरंतर चलि रहल छलैन्ह, आ काल्हि जे खूनक जाँच रिपोर्ट आयल रहन्हि से देखि कऽ डाक्टर कहने रहैन्ह जे आब बहुत सुधार छैन्ह। रक्तचाप सेहो बहुत हद तक सामान्य भऽ गेल रहन्हि।

पुतहु लग किछु आओर सहटि कऽ बईसैत बजलीह बूढ़ी "डाक्टर तँ कहलन्हि जे आब बहुत ठीक छी। आइ अहाँ के देखि लेलहुँ बहुआसिन तँ एकदम्मे चुस्त-दुरुस्त भऽ गेलहुँ।  आब आबथु ने जाँच करय लेल!"

बिहुँसि कऽ बाजलि अनामिका "ई तँ बड्ड नीक गप्प काकी, मुदा स्वास्थ्यक ध्यान राकथु ई।  आब बयस भऽ गेल छैन्ह, पथ्य-परहेजक बहुत खगता छैन्ह।  खाय पीबऽ पर विशेष ध्यान राकथु। "

सासु-पुतहुक गप्प-सप्प चलइत रहलैन्ह। नोकरानी भोजनक ओरियाओन कऽ चलि गेलि। सासु आ देयोरक संगहिँ भोजन कयलक अनामिका। बाहर झिसियाय लागल रहइक।  किछु काल आर गप्प-सप्प कयलक सासुक संग आ घर जाय लेल बिदा भेलि तऽ देखलक जे बुन्ना-बुन्नी तेज भऽ गेल रहइक। सासु रोकि लेलखिन्ह।  कहलखिन्ह "अइ बरखा मे कोना जायब, भिजिये जयब। कनी काल बिलमि जाऊ, बरखा थम्हतइ तऽ राजेंद्र मोटर साइकिल सँ मुन्नू केँ स्कूल सँ लइत अहाँकेँ डेरा छोड़ि आयत। "

अनामिका मानि गेलि रहय, आ सैह बलाय भऽ गेलैक। मुदा दोसर उपयहुँ की रहैक?

सासु के पयर जाँतऽ लागलि। कनिए काल मे बूढी केँ अओंघी लागि गेलन्हि। अनामिका सोचलक एसगरि की करब? किछु काल देयोरे सँ गप्प-सप्प कऽ समय बिता लेल जाय।

राजेंद्र अपन कमरा मे ओछाओन पर पड़ल पढ़ैत रहय। भाउज केँ देखलक तऽ उठि कऽ बैसि रहल। अनामिका लगे मे राखल कुर्सी पर बैसि गेलि। देयोरक हाल समाचार पुछलक। बातचीत होमऽ लगलहि। भाउज केँ एते लग सँ कखनहुँ नहिं देखने रहय राजेंद्र। अबैत छली तऽ बस गोड़ लागि कऽ निकलि जाति छल।  आइयो त सैह केने छल, मुदा आइ स्वयं चलि आयल रहथिन्ह भाउज ओकर कमरा मे। राजेंद्र जुआन छल। देखय-सूनय मे अविरल। गठल शरीर रहइक, अत्यंत आकर्ष। अनामिका केँ ओकरा सँ गप्प कऽ नीक लगलहि।

भाउज सँ गप्प करैत-करैत राजेंद्र के भेलैक जेना ओ भसिया रहल अछि। किछु एहन भऽ रहल छलैक ओकरा जे पहिने कहियो नहिं  भेल रहइक। अपना पर सँ नियंत्रण हराय लागल रहइक। अपन समक्ष सौन्दर्यक एहन प्रतिमूर्ति केँ देखि ओ मतांध होमऽ लागल रहय। स्वयं के रोकबाक बहुत चेष्टा कयलक मुदा विफल भऽ गेल। सहटि कऽ अनामिकाक हाथ पकड़ि लेलकहि। मुँह सँ एक्कहि टा शब्द बहरेलइ - "भउजी!"

अनामिका जेना हठात जड़ भऽ गेलि। रोइयाँ ठाड़ भऽ गेलहि। मस्तिष्कक समस्त सोच-प्रक्रिया जेना एकबैग बिला गेलहि। हृदयक स्पंदन सहसा तीव्र भऽ गेलहि आ ओहो ओही उन्माद मे भसियाय लागलि। राजेन्द्रक आकर्षक व्यक्तित्व ओकरा चुम्बक जेना खींचऽ लगलहि। बाहर बरखा बन्न भेलहि आ भीतर बिहाड़िक आगमन भऽ रहल छलैक। अनामिका मदमत्त सन भेलि नहुँए सँ राजेन्द्रक दीसि बढ़य लागलि…

आ सहसा अनामिकाक मस्तिष्क मे जेना कोनो बिजुरी चमकलहि। ओहि बिजुरिक प्रबल इजोत मे ओकरा प्रकाशक मुखाकृति देखाइ पड़लहि। एकबैग जेना चेतना फेर सँ घुरि अएलहि। ओ झट दऽ राजेन्द्रक हाथ सँ अपन हाथ झिकलक आ ठाढ़ि भऽ गेलि। आँखिक सोझा सबटा फरिच्छ भऽ गेल रहइक। एकटा बिहाड़ि थम्हलैक आ दोसर आरंभ भऽ गेलहि। ओकर गत्र -गत्र में पश्चाताप आ भय मिश्रित अन्हर बहय लगलहि।

एहि अकस्मात प्रतिक्रिया सँ राजेन्द्रक भक्क सेहो टुटलहि। जेना अन्हार कोठरी मे केओ प्रकाश-स्रोतक स्विच दबा देने होइ! ओ धम्म सँ भाउजक पयर पर खसि पड़ल। दूनू आँखि सँ झर-झर नोर बहय लगलहि। अवरुद्ध कंठ सँ स्वर बहरेलहि - "क्षमा कऽ दिय भउजी। भारी अनर्थ करय जा रहल छलहुँ। अहाँ बचा लेलहुँ , क्षमा करू भउजी !"

अपन मोन में उधियाइत गर्दा मे भसियाइत अनामिका बाजलि "के ककरा क्षमा करत? अपराधी जतबे अहाँ, ततबे हमहूँ छी!" आ ई कहइत चोट्टहिं बिदा भऽ गेलि अनामिका ओहि घर सँ। सासु सुतले रहथिन्ह। बाहर बाट पर टेम्पो कयलक आ मुन्नू के लइत अपन घर घुरि आयलि। मुदा घर दोसरे सन लागल रहइक ओकरा। बिहाड़ि बहैत रहलहि।

आ सैह बिहाड़ि एखनहुँ बहैत रहइक ओकर अंतर मे। एहि अन्हर के रोकबाक प्रयास करैत रहलि आ विफल होइत रहलि।

कहुँना दिन बितलहि।  साँझ भेलहि। प्रकाश ऑफिस सँ घुरल। पत्नी केँ  देखलक तँ भिनसरका अवसाद फेर घेर लेलकही। कोनो भाँगठ नहिं। राति भरिक जगरना आ दिन भरिक मानसिक उथल-पुथल अनामिका केर मुहेंठ केँ फूजल किताब बना देने रहइक। बस ओहि किताबक पन्ना पर लीखल भाखा केँ नहिं बूझि पाबि रहल छल प्रकाश।

किछु उत्तेजित होइत पत्नी सँ पुछलक "की भेल अछि से बाजू ने। अहाँ  के हम्मर सप्पत!"

पति सप्पत दऽ देलकहि! चक्रव्यूह मे फँसि गेलि छलि अनामिका। निकलबाक कोनो बाट नहिं। ज्वालामुखी फटबे करतहि, सर्वनाश होयबे करतहि। ओ भले राजेंद्र केँ क्षमा क दियै, मुदा प्रकाश ओकरा कहियो क्षमा नहिं करतहि। पति-परित्यक्ता बनत ओ, ओकर भाग्य में आब यैह लीखल छैक। बिहाड़ि अपन चरम पर पहुँचि गेल अछि, ओकर संसार आब ढहबे करतहि। पति सप्पत द देने रहइक, बाजय आब पड़बे करतहि!

बाजलि अनामिका। प्रकाश केँ सबटा कहि सुनओलक आ अंत में अवरुद्ध कंठ सँ एतबे बाजलि "क्षमा याचना करबाक योग्य हम नहिं रहलहुँ। आब अहाँ जे दंड दी से हमरा स्वीकार्य अछि। "

प्रकाश किछु नहिं  बाजल। निःशब्द सोफा पर बैसि रहल। किछु काल अहिना बितलहि। अनामिका तेसर बिहाड़िक आशंका में स्तब्ध बैसलि रहलि। आँखि भीजय लागल रहइक ओकर।

कने काल बाद प्रकाश सोफा पर सँ उठल आ बाजल "अहाँ के मोन अछि परुका अहाँ के हर्नियाक ऑपरेशन भेल छल?"

अनामिका अवाक् रही गेल। एहि अवसर पर एहि प्रश्नक की औचित्य? बाजलि "हँ मोन अछि। मुदा एखन ई प्रश्न किएक पुछलहुँ?"

पूर्ण गम्भीरतक संग प्रकाश बाजल "पुछलहुँ एहि  कारणे जे एखुनका परिस्थिति मे ई प्रश्न अति महत्वपूर्ण अछि। अहाँ केँ एकटा गंभीर रोग भेल रहय तँय अहाँक ऑपरेशन भेल रहय। जखन हमरा अहाँक रोगक मादे पता चलल तऽ हम अहाँक इलाज करएलहुँ आ की दंड देलहुँ? जहिया कहियो हम दुःखित पड़लहुँ , अहाँ  हमर इलाज में संग देलहुँ आ की हमरा दण्डित कएलहुँ?"

अनामिका फेर भौंचक्क! ई की सब बाजि रहल छथि ई! विस्मित भऽ बाजलि "नहिं, से कतहु भेलइए? रोगी केँ तऽ इलाजे होइत छैक, दंड कियैक भेटतहि?" आँखि एखनहुँ भिजले  रहइक ओकर।

प्रकाश पुनः बाजल "बाह! प्रश्नक उत्तर देलहुँ आ एकटा प्रश्न सेहो कऽ देलहुँ! बेस, तऽ अहाँक प्रश्नहिं अहाँ  केर प्रश्नक उत्तर अछि। दंड कियैक भेटतहि? जहिना शारीरिक दोषक उपचार कयल जाति छैक, दंड नहिं देल जाइत छैक, तहिना मानसिक विकार केँ सेहो उपचारक आवश्यकता होइत छैक। दंडक स्थान कतय छैक एहि में? आ अहाँ  केँ तऽ कोनो उपचारहुँ के खगता नहीं अछि, मोनक विकार केँ तऽ अहाँ उपजिते स्वयं नष्ट क देलियैक। जखन आब रोगहि नहिं, त उपचार कथिक? दंडक तऽ कथे कोन? अहाँक मोन मे बस कोनो बात आयल, अहाँ कोनो अपराध नहिं कएलहुं। जखन अपराधे नहिं तऽ दंड कथीक?"

अनामिकाक अश्रुधारक फाटक फूजि गेलैक। झर-झर नोर बहय लगलहि। पति केर सीना मे माथ टिका लेलक। प्रकाश बिहुँसैत पत्नी के प्रेमालिंगन मे बान्हि लेलक।

पीपर गाछ पर बइसल चिड़ै-चुनमुनी सबहक चिहुँकब फेर सँ संगीतमय भऽ गेल रहइक। बिहाड़ि बन्न भऽ गेल रहैक।