।। सुगंध ।।
हमर किछु शब्द
ओझरायल अछि
वीभत्स / विकराल
मकड़ीक जाल मे
जे बुना रहल अछि
मस्तिष्क मे कतहु..
आ, हमर आलस्य
ऊर्जा दय रहल
जोलहा केँ -
द्रुत गति सँ
बुनि रहल अछि जाल
बढ़ि रहल आकार
असंख्य आखर/शब्द
उड़ि उड़ि क'
ओझराइत जा रहल
जाल मे
हाक्रोश करैत
भीजल आँखि सँ
तकैत हमरा दीसि
क'ल जोड़ने..
बन्हक बनल शब्द समूह
हमर छिड़ियायल/ओझरायल
मृतप्राय संतति
गंधहीन होइत शब्दपुष्प
हे दैब!
आलस्यक विध्वंश अनिवार्य
चैतन्यक अवलंब
नितांत आवश्यक
उठय पड़त
किछु करय पड़त..
पैसि क' मस्तिष्क मे
मकड़ी केँ परास्त कय
हटायब जाल
उद्धार कय शब्दगुच्छ केँ
गाँथब पुष्पमाल
आ, छींट देब सगरे
माटि-पानि पर
शब्दहारक अनुपम सुंगंध
मातृभाषाक अनुराग संग
पैसि जाय कदाचित्
श्वासक बाट होइत
हृदयक अंतर मे
कतहु / ककरो...
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