Sunday, December 7, 2014

इजोत


अनवर आई बड्ड थाकि  गेल रहय।

तीन दिन सँ प्रोजेक्टक रिपोर्ट बनबय मे लागल छल, से आई जा कऽ समाप्त भेलइ। महत्वपूर्ण कार्यक सम्पादन सँ मोन हल्लुक तँ भेलइ, मुदा तीन दिन आ तीन रातुक मस्तिष्क-मंथन सँ मोन उजगुजा सेहो गेल छलैक। शारीरिक श्रम तँ  तेहन किछु नहिं भेल रहैक, मुदा देह सेहो टूटैत सन बुझाइत रहैक।

इच्छा भेलैक एक कप चाह पीबाक।  मुदा चाह ऑफिस कॅन्टीनक नहिं। बेकार चाह बनबइ जाइत छैक कॅन्टीन मे, एकदम पनिसोह! एखन मोन होइत रहैक भोला ठाकुरक होटल बला चाह पीबाक। भोला ठाकुर भले कतबो बदमास हुअय, ओकर होटलक चाह धरि अपूर्व होईत छैक।

अनवर केँ क्यो कहने रहैक जे ८ बर्ख पहिने सीतामढ़ी सँ भोलबा अइ शहर मे आयल रहय। पढ़ल लिखल किछु खास नहिं रहय मुदा अफसरीक छगुन्ता लागल रहैक। तेहन नोकरी कतहु नहिं भेटलइ तँ छोट-मोट नेतागिरी करय लागल। विधायकी चुनाव मे निर्दलीय उम्मीदबार भऽ लड़बो कयलक, मुदा जमानतो जब्त भऽ गेलइ। तहिया सँ लीडरी तँ बंद भऽ गेलइ मुदा गुण्डइ चलिते रहलइ।

आ से जखन वृन्दावन होटलक मालिक रामजीवन साहुक देहावसान भेलइ तँ भोला ठाकुर ओकर होटल पर कब्जा कऽ लेलक। रामजीवनक संतति अधिकार लेबय एलई तँ मारि-पीटि कऽ बइला देलकइ। आमदनी नीक होमऽ लगलइ आ भोला ठाकुरक टनटना गेल।

शहरक मुख्य सड़कक अइ कात अनवरक ऑफिस आ ओइ कात वृन्दावन होटल। चाह-जलखइ करय अनवर ओतहि जाय। कहियो काल भोजनो ओतहि करय। होटलक कर्मचारी सब मैथिले। भोजन-भात, चाह-जलपान सब उत्कृष्ट। भीड़ सदैव लगले रहइक। मनेजरक टेबुल पर भोला ठाकुर चक्का बला कुरसी पर पान चिबबैत विराजमान रहैत छल।

भोला ठाकुर भले कतबहु अनवरक आँखि मे गड़इ, होटलक आन कर्मचारी सब मुदा ओकरा बड्ड नीक लगइ।  ताहि मे एकटा ११-१२ बर्खक छौंड़ा विशेष रूप सँ ओकर ध्यान के खीचि लइ। दुब्बार पातर। सुन्दर, श्यामवर्ण मुँहेँठ पर सदिखन भयक परत चढ़ल। आँखि पैघ मुदा शुष्क। मैल, फाटल टी-शर्ट आ डाँर सँ खसैत निक्कर। हाथ मे सदिखन एकटा प्लास्टिकक ट्रे मे टेबुल सब पर पानि छिंटबा लेल एकटा मग आ पोछबा लेल एकटा स्पोंजक टुकड़ा।   

एक दिन जलखइ करैत बजओने रहैक छौंड़ा केँ अनवर। छौंड़ा डरायले आयल रहैक आ ओकर टेबुल लग ठाढ़ भ गेल रहै। अनवर देखने रहै ओकर दूनू तरहत्थी पर ३-४ टा कऽ फोंका। बाँहि आ टाँग पर चोटक निसान।

"की नाम छउ बाउ?" अनवर पूछने रहइ

"सत्तन" पातर बाल-स्वर फूटल रहैक।

"एतय काज कियैक करइ छैं, स्कूल कियैक नहिं जाइत छैं?" अनवर दोसर प्रश्न केने रहै। 

छौंड़ा मौन रहलइ। 

"देह पर ई चोट कोना लगलौ?" फेर एकटा प्रश्न। 

छौंड़ा चुप्प रहलइ।

"क्यो मारलकउए?"

छौंड़ा बौक रहलइ। डरे देह थरथराय लगलइ।

 "माय -बाप कतय छऊ?"

"काज अइ, जाइ छी" कातर बाल -स्वर फूटल रहइ।

मारिते रास अनुत्तरित प्रश्न ल कऽ ओइ दिन वृन्दावन होटल सँ बिदा भेल छल अनवर। 

आरो कतेको रास प्रश्न सन्हिआय लागल रहैक मस्तिष्क मे। कोमल शैशव केँ अइ अवस्था मे ई गति! बालपनक एहन स्वरुप किएक? शिक्षाक संवैधानिक अधिकार की  केवल कागती औपचारिकता मात्र छैक? बाल-श्रम विरोधी कानून की खाली राष्ट्रीय टेलीविज़न समाचार चैनल सब पर दिन-राति परसल जाइत अनर्गल शास्त्रार्थक विषय-वस्तु होयबाक लेल बनाओल गेल छैक?

एहने आर कतेको प्रश्न उद्वेलित करैत रहलइ अनवर केँ ओइ दिन। ऑफिसक अन्य कर्मचारी सभ सँ पूछने रहय सत्तनक मादे।  एकटा पुरान सहकर्मी कहने रहै सभटा खिस्सा।  सत्तनक बाप बिरजुआ भोले ठाकुरक होटल मे भनसिया रहैक।  अथाह नीक लोक। भोजनो दीब बनबय। एक दिन भिनसरे मदर डेरीक बूथ सँ दूध लाबय लेल सड़क पार करैत रहय की कोनो मदमत्त ट्रक चालक ठोकर मारि कऽ भागि गेलइ। बिरजुआक ठामहिं प्राण छूटि गेलइ।

मास भरि पहिने सहरसा सँ १० बर्खक बेटा केँ लऽ कऽ घुरल रहय बिरजू। जाय सँ पहिने तीन हजार टाका पैंच लेने रहैक भोला ठाकुर सँ। कहने रहैक जे गाम जाइत छी तँ किछु जमीन बेचब। घुरिते पाई लौटा देब। मुदा ओकर घुरबाक किछुए दिन बाद ई दुर्घटना भऽ गेलइ। ठाकुर केँ अप्पन पाइ बुड़ैत बुझना पड़लै तऽ छौंड़ा केँ बँधुआ काज पर लगा लेलक।

किछु मासक बाद सत्तनक माय आयलो रहैक बेटा केँ लऽ जाय लेल।  मुदा भोलबा कहलकइ जे तीन हजार टाका मूल आ दस टके सैंकड़ाक दर सँ सात मासक सूदि एक्कइस सय टाका जोड़ी कऽ कुल एक्कावन सय टाका ओकर हाथ पर धऽ दइ आ बेटा के लऽ जाय। सत्तनक मायक लेल ई असंभव रहैक। कतबो कनलै-खिजलै, कतबो मिनती-नेहोरा केलकइ, भोला ठाकुर लेल धनि सन। धकिया कऽ भगा देलकइ। कहाँदन मौगी बताहि भऽ गेलइ।  रेलगाड़ीक आगाँ छरपि कऽ कटि गेलइ।

तँ से तखिने सँ सत्तन बेगारी खटि रहल छल भोला ठाकुरक होटल मे। बात-बात पर ठाकुर छौंड़ा केँ मारइ-पीटइ, बड्ड दुर्दसा करइ। दरमाहा देबाक तँ बाते कोन !

सब खिस्सा सूनि अनवरक मोन आर तीत भऽ गेल रहइ। ने भरि दिन ऑफिस मे काज करय मे मोन लगलइ, ने राइत भरि निन्न भेल रहैक।  ओछाओन पर कछमछाइत रहि गेल रहय। मोनक शांतिक लेल फादर एडवर्ड केँ स्मरण कयने रहय।

फादर एडवर्ड एक्का। शहर मे प्रवेश करबा सँ किछुए पहिने सड़कक दछिनबारी कात जे बड़का गिरजाघर छैक, तकरे मुख्य पादरी छलाह फादर एडवर्ड। मध्यम कद-काठी, श्यामवर्ण रूप, ठोर पर सदति निश्छल मुस्कान आ आँखि सँ निरंतर बहराइत स्नेह-किरण। दुइएटा काज मात्र - ईश्वरक आराधना आ समाजक निष्काम सेवा।

गिरजाघरक कंपाउंड मे आर दू टा मकान।  एकटा मे मातृ-पितृ विहीन धिया-पुता सभक लेल पाठशाला आ दोसर मकान मे छात्रावास। एहि सब सरंजामक व्यक्तिगत रूप सँ ध्यान राखथि फादर एडवर्ड। कोनो धिया-पुता केँ कनिको कष्ट होइ तऽ करेज फाटऽ लगइन फादर एडवर्डक।

सैह फादर एडवर्ड एक दिन एकटा ३ बर्खक कनैत नेना केँ लऽ कऽ गिरजाघर आयल रहैथ। शहर गेल रहैथ कोनो  काज सँ। घुरैत काल सड़कक कात मे एहि नेना केँ कनैत देखलखिन। गाड़ी थम्हौलनि। नेना केँ कोरा मे उठा कऽ बड़ी काल धरि ओकर माय-बापक प्रतीक्षा कयलनि। अंततः थाना मे सूचना दय नेना केँ गिरजाघर लेने गेलखिन। नाम पुछलखिन तँ कहलकनि "बेटू"। माय-बापक मादे पुछलखिन तँ नेना कनिते बाजल छल "अम्मी, अब्बू !"

क्यो नहीं एलहि ओहि नेना के लेबय लेल।  गिरजेघर मे पालन पोषण भेलइ। ओत्तहि आरंभिक शिक्षा-दीक्षा। जुम्मा मस्जिदक मौलवी साहेब कुरान-शरीफक ज्ञान-वर्षा केलखिन। आगाँ कॉलेज गेल। एम. बी. ए. कएलक। पढ़ितो रहल आ गिरजाघरक पाठशाला मे पढेबो कएलक। बड्ड स्नेह सँ फादर एडवर्ड ओकर नाम रखने रहथिन - मोहम्मद अनवर। अनवर - माने इजोत। "छौंड़ा खूब काज करत, अन्हार मे इजोत करत".…

मुदा कहाँ कतहु इजोत केने रहय ओ? अनवरक ह्रदय कलपि उठलइ। जहिना सब पढ़ैए तहिना पढ़ैत रहल। जहिना सब जीबैए तहिना जीबैत रहल। बहुराष्ट्रीय कम्पनी मे नोकरी भेलइ। पाइ अबैत रहलै, पाइ जाइत रहलै। खेलक, पीलक, पचओलक। जहिना सब करैए तहिना करैत रहल। नदीक धार संग बहैत रहल। छी छी छी! की करैत रहल? की करैत रहल!… 

हठात भक्क टुटलई। अतीतक अकास मे बौआइत-ढहनाइत अंततः वर्तमानक भूमि पर खसल अनवर।

पिउन आयल रहैक चाह-बिस्कुट लऽ कऽ। 

खिन्न मोने बाजल अनवर " लऽ जो। ई नञि पील हएत। "

पिउन बड्ड मानइ ओकरा। स्नेह सँ कहलकइ "पी लियऽ ने, जखन सँ एलहुँ, पानियों नञि पीने छी।" 

अनवर कुरसी सँ उठैत बाजल "जाइ छी ठाकुरक होटल। ओत्तहि चाह-जलपान कऽ लेब।"

नहुँए-नहुँए  डेग धरइत होटलक दीसि बिदा भेल अनवर। देह बड्ड भारी बुझाइत रहैक। जेना माथ पर एक ढाकी पजेबा लादल होइ। 

होटल मे बैसि कऽ दू टा समोसा आ एक कप चाहक आर्डर देलकइ अनवर। बैरा समोसा आ चाह आनि कऽ दऽ  गेलइ।

सबसँ आगा बला टेबुल पोछि  रहल छल सत्तन। ओही टेबुल पर एकटा जोड़ा अपन ५-६ बर्खक बच्चा केँ  लऽ कऽ बैसि गेल। बच्चा हाथ मे एकटा गेन लेने खेलय मे  मग्न छल।  सत्तन टेबुल पोछि क आगू बढ़ल। खेलाइत-खेलाइत बच्चाक हाथ सँ गेन छुटि गेलइ आ सत्तन दीसि गुड़ैक गेलइ। बच्चा गेन लेबऽ दौगलइ आ सोझे सत्तन सँ टकरा गेलइ। सत्तन असंतुलित भऽ गेल आ ट्रे मे राखल मगक सबटा जल सामने सूट-बूट पहिरने एकटा ग्राहक पर जा पड़लइ। ग्राहक चिचियाइत ठाढ़ भऽ गेल।

सत्तन डरे काँपय लागल। मुँहेँठ आरो सुखा गेलई। मनेजरक टेबुल पर सँ उठि क भोला ठाकुर दौगल आयल आ छौंड़ा के गारि पढ़ैत लतियाबय लागल। सत्तन डिरियाइत रहल, आ कुटाइत रहल।

तामसे लाल भऽ गेल अनवर।  ठाकुर केँ ठेल कऽ छौंड़ा केँ छोड़ौलक आ ओकर गट्टा पकड़ि आगा बढ़ल।


ठाकुर सम्हरल आ अनवरक आगू आबि ठाड़ भऽ चिकरल "बच्चा के छोड़ि दियउ अनवर मियाँ, नहिं तऽ अनर्थ भऽ जायत!"

होटलक मेन गेट पर सँ गोरखा दरबान दौगल एलै आ अनवरक हाथ मे अप्पन खुकरी थमा देलकइ। अनवरक आँखि सँ धधरा उठैत रहइ। ठाकुर केँ खुकरी देखबैत गरजल "ठामहिं रुकि जो ठाकुर नहिं तऽ चीरि कऽ राखी देबउ !"

भोला ठाकुरक शरीर मे जेना सोनित बहब बन्न भऽ गेलई। खुकरी तक ओकर नजरियो नहिं गेलइ। अनवरक आँखिए देखि कऽ देह सुन्न भ गेलइ। कहुना दू डेग पाछू भेल। आर जे लोक सब तमासा देखइत रहय, सेहो सब कात धेलक।

सत्तनक हाथ धेने अनवर गोरखाक हाथ मे खुकरी धरइत होटल सँ बहरायल।  सड़क पर आबि एकटा रिक्शा कयलक आ गिरजाघर दीसि बिदा भेल। सत्तन भरि पाँज कऽ पँजियोने रहइ ओकरा। ओ नेनाक केस मे हाथ फेरैत रहल।

ओकरा भेलइ जेना माथ पर सँ पजेबाक ढाकी उतरि गेल होइक। आ, सत्तन केँ देखि कऽ बुझेलइ जे ओकरा लेल वृन्दावन होटलक महाकाय अन्हारक अंत भऽ गेल छलैक।

आगाँ मात्र इजोतक महासमुद्र रहैक। इजोते-इजोत…


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