कानय मेघ आ काँपय वसुधा
ई केहन व्यवहार कहू
विरह भाव ककरहु, क्यो डूबय
ई केहन अतिचार कहू
आफत मे छै प्राण चिड़ै केर
नोर बहै झर-झर सदिखन
पाँखि काटि क' कहै जे उड़ि जो
ई केहन सत्कार कहू
सात जन्मकेँ प्रण केने छल
बरखो भरि ने संग रहल
मटिया तेल कहै जे जरि जो
ई केहन चित्कार कहू
बेंतक मारि सहैए छौंड़ा
खाता-पिलसिन सब निंङ्घटल
थेत्थर मोन कहै जे अड़ि जो
ई केहन अधिकार कहू
युग-युग सँ अछि दैत परीक्षा
युग-युग सँ पपनी भीजल
धरती फाटि कहै जे गड़ि जो
ई केहन संसार कहू
सोनित घीचि हाट पर बेचय
ई केहन बाजार कहू
अपने सँ अपनहि घर डाहय
ई केहन प्रतिकार कहू...
हैदराबाद
०१/०३/२०१५
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