Thursday, February 19, 2015

अवसान

एह!
नहि कानू अनेरे
उठू
हँसै जाउ
आनन्द मनाउ..

ई हम कहाँ?
ई तँ अछि हमर
गन्हाइत मैल गुदड़ी
जे नहि राखि सकल सम्हारि
औनाइत प्राणकेँ
नीके भेल
आब पहिरब न'ब नूआ
सुन्नर / चकाचक..

एह!
नहि कानू फुसिये
उठू
गीत गबै जाउ
उत्सव मनाउ...

हैदराबाद
१९/०२/२०१५

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