Wednesday, February 18, 2015

रिक्सा

काल्हि तक रहै
जे निहुरल मूड़ी
से आइ कने
सोझ छै
धसल सीना
आइ कने
तनैल छै..

अपन घाम सँ
पटबैत रहल निरन्तर
छौंड़ीक भविष्यक भूमि
छींटैत रहल ओकरा लेल
संस्कारक बीया
खींचैत रहल मनुक्ख के
तीन चक्का पर
ऊर्जा लैत रहल
छौंड़ीक अद्भुत मेधा सँ..

छौंड़ी भेलैए आई
बड़का हाकिम
धियाकेँ कहलकैए
माथ ठोकि
खूब असीरबाद दैत
हाकिम भेलैहें
धरि हाकिम नहि होइहें
मनुक्खे रहि
मनुक्खक काज करिहें
गे बौआ..

कान्ह परहक गमछा सँ
आइ घाम कम
आँखि बेसी पोछैए
अभिमानक भान छै
गौरवक बोध छै
धरि उड़ैए नहि ओ
अकास मे
पैर दुनू औखन छै
रिक्साक पैडिल पर..

घूमि रहल छैक चक्का
ल' जा रहल छैक
आगू दिस
बेस फुर्ती सँ...

हैदराबाद
१८/०२/२०१५

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