Sunday, February 1, 2015

उत्पात

समयक विशाल चक्र
दुराचारक कुचक्र
चलबे करतइ
चलिते रहतइ
तैं की?

विश्वास त्यागि
न्याय-विवेक सँ भागि
बैसि रहत
ठुट्ठ गाछक त'र?
मौसमक सङोड़ मे
पतझड़हु छै
तैं की?

अंतर्मन मे
झरकक कोलाहल
ह्रदय सँ झहरैत
सिनुरिया घाम
शीतल पुरबाक आस मे
कर्मठ रहत
बेस रौदी छै
किछु दिन लेल
ग्रीष्मक कुठाराघात छै
तैं की?

ओ बाझल अछि
माटिपानिक सेवार्थ
लागल अछि
इतिहासक उर्वर माटि खोदि
भविष्यक गाछ रोपय मे
किछु टांग-खिचनिहार छै
बानरक उत्पात छै
तैं की?

हैदराबाद
०१/०२/२०१५

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