हे देखियौ
ई छौड़ीक चालि!
नास क' देलक
कविताक पोथी के
रंगीन पिलसिन सँ
दकचि देलक
पन्ना सब
फाड़ि-चीर देलक
हे सरस्वती
सब सत्यानास..
थम्हू थम्हू..
नहि नहि!
सत्यानास नहि
ई त' भेल आर दीब
आर सजीव
आह, अद्भुत!
बेरंग कागत पर
कारी आखरक मलिन पाँति
क्लांत-कलुषित पद
निष्प्राण पृष्ट संयोजन
भ' उठल अछि
अनायसहिं
कते रंगमय
कते जीवंत..
फाटल पन्ना
सम्पादित क' काव्य केँ
बना देने अछि
कतेक परिपूर्ण
कतेक सम्पूर्ण..
समर्पण पृष्ट के
कने फाड़ि क'
हमहूँ दकचि दैत छियै
रंगीन पिलसिन सँ
अपन सरस्वती-
अइ छौड़ीक नाओं..
यैह!
आब भ' गेल
आखर-पाँति-पद-कविता
सरिपहुं दीर्घायु
कालजयी....
हैदराबाद
०१/०२/२०१५
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