Saturday, February 21, 2015

सर्जक

कवि जी!
किए रचै छी?

कलमक धोधि मे
मोसि भरै छी
आ एमहर
अपनहि उदर टटैल..

औ जी!
किए रचै छी?

लोकक हिय के
सरस करै छी
आ देखू
अपनहि हृदय सुखैल..

धुर जी!
किए रचै छी?

सबहक मन मे
दीप लेसै छी
आ सदिखन
अपनहि चूल्हि पझैल..

मर जी!
किए रचै छी?

जन-मानस केँ
पथ देखबै छी
आ बूझू
अपनहि बाट घेरैल..

कवि जी!
किए रचै छी?

हैदराबाद
२१/०२/२०१५

No comments:

Post a Comment