कवि जी!
किए रचै छी?
कलमक धोधि मे
मोसि भरै छी
आ एमहर
अपनहि उदर टटैल..
औ जी!
किए रचै छी?
लोकक हिय के
सरस करै छी
आ देखू
अपनहि हृदय सुखैल..
धुर जी!
किए रचै छी?
सबहक मन मे
दीप लेसै छी
आ सदिखन
अपनहि चूल्हि पझैल..
मर जी!
किए रचै छी?
जन-मानस केँ
पथ देखबै छी
आ बूझू
अपनहि बाट घेरैल..
कवि जी!
किए रचै छी?
हैदराबाद
२१/०२/२०१५
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