Friday, January 9, 2015

कर्मयोग


श्यामवर्ण
सुन्दर सुगठित देह
मुहेँठ पर अलौकिक आनंद
ओजमय श्रमिक
तेजमय देवपुत्र

बेहिसाब बोझ सँ
लदल ठेला
खींचि रहल केहन संकल्प सँ
ई श्रमिक देवपुत्र!
जेना विजयी भ' रहल हो
कुरुक्षेत्रक रणभूमि मे
जेना श्रवण कय घोंटि गेल हो
कर्मयोगक सम्पूर्ण अध्याय

ई विजयोत्सव होइत छैक
प्रतिदिन / प्रतिक्षण
भोर-साँझ / दिन-राति
उत्सव मे नचैत
समस्त संसार
लादैत बोझ लगातार

झहरैत घाम
चमका रहल छैक देह
ओहिना जेना
घृत-स्नान कय
चमचमाइत छथि
घसाइत/रागड़ाइत
बाबा बैद्यनाथ

नहि नहि!
कोनो अभियोग नहि
कहाँ कोनो रोष
कहाँ ककरो दोष
किए अनसोहांत
केहन बोझ
कहाँ कोनो भार
उघैत अछि बिहुँसैत
तपस्या मे भीजैत
युध्द मे जितैत
कर्मयोगक उद्धारक!

कोना बुझेतै भारी
केहनो बोझ ओकरा
जे उघि रहल हो सतत
निरंतर / सपरिवार
जीबैत रहबाक भार
खेपैत रहबाक बोझ

चलैत रहतैक योगीक
चिर समाधिक खोज..

हैदराबाद
०९/०१/२०१५

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