Sunday, January 25, 2015

सुता-संकल्प

हे हमर पिता
धन्य छी अहाँ
चकित छी हम
देखि क' अहाँक
संयमक अथाह सागर
की छैक एकर स्रोत
कहाँ छैक एकर अंत
भ्रमित छी हम
धन्य छी अहाँ
हे हमर पिता!

अपस्याँत भेल अहाँ
कइएक बर्ख सँ
हमरा बुझने
कइएक कल्प सँ
की अछि विवशता
हे हमर पिता
की तकैत छी अहाँ
ककरा तकैत छी
आक्रोश अछि हमरा
किए तकैत छी
व्यर्थ अछि ई
अहाँक सतत साधना
प्रदूषित जान-समाज सँ
विलुप्त भ' रहल अछि
ओ निर्बल प्राणी
जकर संधान मे
छिछिआइत छी
कइएक बर्ख सँ
अपस्याँत भेल अहाँ

याचना अछि हमर
अंत करू आब
एहि यंत्रणा के..

सुता छी अहाँक
कोनो विवशता नहि
नहि अछि स्वीकार्य हमरा
बनब अहाँक यंत्रणक मूल
नहि अछि प्रयोजन
किनबाक हमरा लेल
पुरुषक आकृति मे
नरभक्षी पशु
जकर सामीप्य-मात्र सँ
मरैत रहब हम
प्रतिदिन-प्रतिक्षण-बारम्बार
जीबय दिय'हमरा
हे हमर पिता!

संकल्प अछि हमर
नहि करब हम अर्पित
अपन सर्वस्व
बिकाऊ पुरुखक हाथ
विदेह छी अहाँ
वैदेही छी हम
प्रतीक्षा करत हमर वरमाल
ओहि श्रीरामक
उठा क' ध्वस्त करता जे
परिपाटीक शिव-धनुष
हे हमर पिता
संकल्प अछि हमर..

राँची
०९/०७/२००२

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