Wednesday, January 7, 2015

विश्वासघात

विश्वासक घेंट पर सँ
ई कुरहरि
हटा लिय'
मुइत विश्वास तँ
मरब हमहूँ, अहूँ
मरत समस्त विश्व
सकल संसार..

माटि बीज संग
जड़ि पात संग
सुरुज भोर संग
गंध फूल संग
ज्ञान सत्य संग
जँ करय विश्वासघात
तँ करू कल्पना
केहन जंत्रणा
कतय संभावना
ब्रह्मंडक अस्तित्वक?

विश्वासक घेंट पर सँ
ई कुरहरि
हटा लिय'
नहि तँ
कुहरि-कुहरि मुइल
जगतक चिता केँ
के देत आगि?
के करत श्राद्ध?

हैदराबाद
०७/०१/२०१५

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