Friday, January 30, 2015

घाम

लगइए
हवा किछु बदलि रहल अछि
कनकनी कने कमलइए
कखनो काल
घामक किछ बुन्न सेहो
अभरि जाइत अछि कपार पर
बदलि त' रहल छैक किछु
निश्चित..

सुनलियइए
अपन आत्मसम्मान पर
ककरो अनर्गल स्पर्श होइतहि
एक वीरांगना
थपड़िया देलकइ मनसा के
बीच बजार मे
सार्वजनिक प्रत्याघात
तत्काल..

सुनलियइए
सुनैत रहैत छी
बीच-बीच मे
भ' रहल छैक पलटवार
सरिपहुँ..

ठीके
हवा बदलि रहल छैक
घामक किछु बुन्न
अभरि रहल छैक
सभतरि...

हैदराबाद
३०/०१/२०१५

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