हमर मायक
कोटि कोटि संतति
सभतरि
छीटल छिड़िआयल
जतय ततय
हमर मायक
कोटि कोटि संतति..
हमर माय
एक विशाल वृक्ष
संतति सब लुधकल
क्यो जड़ि धेने
क्यो डाड़ि पर बैसल
क्यो लटकल
क्यो गाछ सँ दूर
पड़ेबाक ब्योंत करैत
आ मारिते रास धी-पूत
पड़ा गेल पहिनहिं
दूर, बहुत दूर
कतहु सुखाइत टटाइत
कतहु कुटाइत पिसाइत..
क्यो गाछहिं पर बैसल
चैन सँ
चूसि रहल ओकर प्राण
क्यो लाज त्यागि
बेचि रहल गाछक
फल-फूल
डाड़ि-पात
क्यो सोहि रहल छाल
क्यो अ'ढ़ मे
बना रहल
गाछहिं केँ
अपन अस्तित्वक ढाल..
क्यो मतान्ध भेल
चढ़ि रहल
फुनगी दीसि
गछहिं पर रहि
यथासंभव
जड़ि सँ
दूर रहबाक नेयार
क्यो भीड़ लगा
बैसल फुनगी पर
कहुना पोन रोपि
यैह खसल
वैह खसल..
धरि ध्यान नहि
जखन खसत
फुनगी पर सँ
आ की, कतहु सँ
तँ बजरत भूमि पर
जड़िये लग
चेत बा अचेत
अंतिम आश्रय
अहि गाछक
हमर माय मैथिलीक
वैह छाँह
वैह जड़ि...
कोलकाता
१७/०१/२०१५
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