Sunday, January 25, 2015

करू न'ब श्रृंगार

आउ हे सजनी
करू न'ब श्रृंगार

चलू देख ली
अही आँखि केर
नवल दृष्टि सँ
केहन दिव्य सन
लागि रहल अछि
यैह विश्व-संसार

जुनि पहिरू
ओ नबका नूआ
यैह ठीक अछि
फाटल-चीटल
चेफरी साटल
ओढ़ि लिय' बस
एकरे पर सँ
लाजक ओढ़ना
जे फेकल अछि
चहुँदिस त्यागल
नव समाज केर
दुहिता सभ सँ

जुनि लगाउ प्रिय
कमलनयन मे
करिया काजर
रहय दियउ ने
नीक लगइए
लगा लिय' बस
एहि नयन मे
धाख बुजुर्गक
मान समाजक
जुनि लगाउ प्रिय
कमलनयन मे
हे मृगनयनी
करिया काजर

जुनि लेपू
अहि पुष्प-अधर के
मिथ्या-कृत्रिम
लाल रंग सँ
ओढ़ने जे छी
लाजक ओढ़ना
ओही सत्य सँ
अरुण भेल अछि
ठोर अहाँके
दीब लगइए
आह कामिनी!
जुनि लेपू
अहि पुष्प-अधर के
मिथ्या-कृत्रिम
लाल रंग सँ

बाह मानसी!
एहि श्रृंगार मे
मान भरल अछि
शिष्टाचारक
रंग चढ़ल अछि
देख लिय' जे
ओही आँखि केर
नवल दृष्टि सँ
केहन दिव्य सन
विश्व वैह ई
लागि रहल अछि

आउ हे सजनी
नव श्रृंगारक
संग बनाबी
सुंदरता केर
नव परिभाषित
चलू हे सजनी
बाट बनाबी

राँची
२०/०७/२००२

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