माथ पर
एक ढाकी पाथर लदने
चलि जाइत छलि ओ
निर्निमेष
मौलायल मुँहेंठ परहक घाम
उज्जर आँचर सँ पोछैत
जेना पोछि रहल हो
अप्पन नहि
हमरे मुँह पर लागल
कारी गन्हाइत कादो
उजड़ल सींथि
रंगहीन आवरण
गट्टा सुन्न
भीजल आँखि
सुखायल ठोर
दृष्टि/सांस/जीवन
सब किछु सुन्न
चलि जाइत छलि ओ
अंतहीन पथ पर
तबधल बालु के धङैत
निष्प्राण
माथक भितरका भार
बना देने सहज
माथ परहक बोझ केँ
तूरक फाहा सन
सद्यः पुलकित पुष्पक
वैधव्यक भार
समाजक कतबो विकसित
तराजू
तौलि सकलइए
आइ धरि?
हैदराबाद
२४/०१/२०१५
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