काल्हि राति, आ
आइ भोरक मध्य
यात्रा छल बड्ड दीर्घ
बड्ड असाध्य..
चलैत रहलहुँ
बताह भेल
गर्म बसात मे
तपल सड़क पर
भरि राति
बड़ी काल धरि..
बढ़ैत गेल डेग
आगिक धधरा पर
आ होइत रहल
अनंत उल्का-वृष्टि
अंग-प्रत्यंग पर
सगरि राति
कतेको काल तक..
देखू ने
फोंका पड़ल अछि
दुनू पएर मे
भरि देह मे
जहाँ तहाँ..
जहन गेबे केलहुँ
तँ अबैत छी किएक
अनेरे
विकल राति के
निठुर स्वप्न मे..
बूझैत नञि छियैक
विछोहक असरि
होइत छैक
सुनगैत कोइला सन
तप्पत
बड्ड तप्पत
जकर तापमान
बढ़ि जाइत छैक
एसगरुआ रातिक
बड़कैत निन्न मे...
कोलकाता
१६/०१/२०१५
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