साहित्य पथ पर अनवरत यात्रा.....
किछ संबंधक समीकरण होइत छैक बड्ड बिचित्र..
छोटकी बड्ड तंग करैछ पितामही केँ एह! एक्काहु क्षण चैन नहि..
आ जखन कखनहुँ फराक होइछ दुनू तखन मोन लगैत छैक ने एकरा तंग करय मे ने ओकरा तंग होमय मे...
हैदराबाद २७/०१/२०१५
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