Friday, January 23, 2015

मुक्ति


बेस इजोरिया राति छलै
चंद्रकिरण झहरैत छलै
कनकन पछबा छल नाचि रहल
कटकट हाड़हु छल सिहरि रहल..

तँ एहने सन परिवेश छलै
आँखिक सोझा किछु चमकल छल
हम ठमकि गेलहुँ, हम सहमि गेलहुँ
कारी कटकट किछु सूझल छल..

किछु ल'ग गेलहुँ, तँ हे शंकर!
ओ छौंड़ा नङटे सिकुड़ल छल
ओस-स्नान सँ भीजल छल
तैं चन्द्रकिरण सँ चमकै छल..

श्वास बन्न, आभास बन्न
सूतल छल ओ चिर-निद्रा मे
संत्रास बन्न, अतिचार बन्न
उन्मुक्त गगन मे विचरै छल..

ओ नग्न मुक्त प्रस्थान केलक
किछु आर नग्न संसारहु भेल
हम्मर अपनहिं ई आँखि दूनू
हमरहु नङटे सन देखने छल

सब भाव सन्न, सब ज्ञान सन्न
मानवता केर उन्माद बन्न...

हैदराबाद
२३/०१/२०१५

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