Saturday, January 10, 2015

परिपाटी

।। परिपाटी ।।

हम बढ़लहुँ
एक डेग आगाँ
ओ खिचलनि
दू डेग पाछाँ..

लिय'
पहुँचि गेलहुँ
अनायास
एकहि डेग मे
आगामी काल्हि सँ
बीतल काल्हि मे
हुनकहि लग
हुनकहि संग
भेंट भेल
फेर एक बेर
उसनल राग
खोखड़ल रंग..

आब लेढ़ाइत रहब
उड़बैत रहब गर्दा
अतीत मे सन्हिआयल
घिघियाइत रहब
सुअदगर व्यथाक
चहटगर धांगल कथा
गढ़ैत रहब
आ लिखैत रहब
पीटल पिचायल कविता
भविष्यक अन्धकार पर..

हे!
करैत छैथ
बड्ड मेहनति
मोन-प्राण सँ
सशक्त करैत
बचओने छथि पंथ
रूढ़िक महंथ..

चलैत रहय ई
मुहिम अविराम
कर्क मानसिकता केँ
दंडवत प्रणाम!

हैदराबाद
१०/०१/२०१५

No comments:

Post a Comment