।। डारि ।।
पुरना आवास
अतीतक आभास
मृदु-कोमल सीत
ह्रदय केँ छूबैत
कवि नज़रूलक गीत..
भरि घर
चौपेति क' राखल
स्मृत-विस्मृत
कतेको इतिहास
कतेको हर्ष
कतेको विषाद
कतेको गंध
कतेको स्वाद..
खिड़कीक बाहर
नीमक गाछ
गाछ पर सँ
कोइलीक वैह
चिर-परिचित गीत
पुछैत अछि भरिसक
कोना छह?
कतय छलह?
एतय सँ
किए गेलह मीत?
बौआइत चिड़ै
नोरायल आँखि
समटि क' पाँखि
फेर आबि बैसल अछि
किछु क्षणक लेल
अतीतक संग
हृदयालाप करैत
ओही गाछ पर
ओही डारि पर...
कोलकाता
१४/०१/२०१५
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