Thursday, January 1, 2015

विषकन्या

हे विषधर
कने बिलमि जाउ
क्षण-दू क्षण
कने ठमकि जाउ

बूझल अछि
फूसि अनुराग मे
कसबे करब
स्वाभाव सँ विवश
डसबे करब
माहुर मिश्रित प्रेम
परसबे करब
छल-प्रपंचक धार
बहेबे करब
जे करबाक
करबे करब
मुदा
कने ठहरि जाउ
हे विषधर
कने बिलमि जाउ

हमरा अछि
किछु कहबाक
से सुनल जाओ
हे विषधर
किछु गुनल जाओ

कहि माता
भार्या-पुत्री-भगिनी
खूब ठकलहुँ
समाजक प्रत्यक्ष मे
आ -
परोक्ष मे
अनवरत
अंग-अंग कसलहुँ
पोर-पोर भोंकलहुँ
स्वादि-स्वादि डसलहुँ

मुदा आब
समयक चक्र
घूमि गेल
परिस्थिति किछु
बदलि गेल
दीर्घकाल सँ
ग्रहण करैत अहाँक विष
हमहूँ भ' गेल छी आब
विषाक्त

हम नही करब छल
ने कोनो प्रपंच
नहि डसब स्वादि-स्वादि..
परोक्ष नही
प्रत्यक्ष मे हएत
हठात् वज्रपात
विषाक्त प्रत्याघात
आ क्षण भरि मे
छल-प्रपंचक विनाश
विश्वासघातक
ठामहिं सर्वनाश

हे विषधर
कने बिलमि जाउ
विषकन्या सँ
कने सहमि जाउ..

हैदराबाद
०१/०१/२०१५

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