देखि क'
ओ सब जे
देखैत छी
फूजल आँखि सँ
भ' जाइत छी
तेना ने भयाक्रांत
जे मोन होइत अछि
मुँह झाँपि क'
कोनो अबोध नेना सन
सूति रही चुपचाप
अन्हारक आँचर मे नुका..
मुदा सूति नहि पबैत छी
मुँह झाँपि क'
किएकी
अपनहिं सांसक धाह
आदंकी झरकक आघात सन
झुलसाबय लगैत अछि
आ, एना मे
मुनलो आँखि
किछु भयानक चित्र
देखाबय लगैत अछि
क' दैत अछि
बड़कइत घाम सँ
सराबोर..
कहाँ छोड़ैत अछि
निष्ठुर / डराओन
वास्तविकताक दैत्य
केहनो अन्हार मे
मुनलो आँखि मे...
हैदराबाद
२१/०१/२०१५
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