हे कवि!
किए एहन अवसाद
किए बहैत अछि नोर
किए ऐना अवसन्न
किए व्यथा घनघोर?
धरू धैर्य
करू विश्वास
ई मानसिक दर्द
किन्नहु नहि अछि
व्यर्थ वेदना
दियौ ध्यान
ई थिक अहाँक
सुच्चा सृजन क्रीड़ा
कवित्वक प्रसव पीड़ा!
भ' रहल छैक जन्म
निश्चित
प्रबल नव-संवेदनक
प्रखर जन-साहित्यक..
आँखि सँ बहैत मोसि
बहरायत कलमक नोक सँ
चढ़त रंग बेजोड़
उज्जर कागत पर..
धैर्य धरू
बस किछु क्षण आर...
हैदराबाद
२१/०१/२०१५
No comments:
Post a Comment